यावद्धेतुफलावेशस्तावद्धेतुफलोद्भवः ।
क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥ ५५ ॥
क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥ ५५ ॥
yāvaddhetuphalāveśastāvaddhetuphalodbhavaḥ .
kṣīṇe hetuphalāveśe saṃsāraṃ na prapadyate .. 55 ..
जबतक हेतु और फल का आग्रह है तबतक ही हेतु और फल की उत्पत्ति भी है । हेतु और फल का आवेश क्षीण हो जाने पर फिर हेतु और फलरूप संसार की उत्पत्ति भी नहीं होती ॥ ५५ ॥
जबतक हेतु और फल का आवेश-हेतुफलाग्रह अर्थात् उन्हें आत्मा में आरोपित करना यानी तच्चित्तता है, तबतक हेतु और फल की उत्पत्ति भी है अर्थात् तबतक धर्माधर्म और उनके फल की अविच्छिन्न प्रवृत्ति भी है । किन्तु जिस समय मन्त्र और ओषधि की सामर्थ्य से ग्रह के आवेश के समान उपर्युक्त अद्वैतबोध से अविद्याजनित हेतु और फल का आवेश निवृत्त हो जाता है उस समय उसके क्षीण हो जाने पर हेतु और फल की उत्पत्ति भी नहीं होती ॥ ५५ ॥
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यावद्धेतुफलयोरावेशो हेतुफलाग्रह आत्मन्यध्यारोपणं तच्चित्ततेत्यर्थः, तावद्धेतुफलयोरुद्भवो धर्माधर्मयोस्तत्फलस्य चानुच्छेदेन प्रवृत्तिरित्यर्थः । यदा पुनर्मन्त्रौषधिवीर्येणेव ग्रहावेशो यथोक्ताद्वैतदर्शनेनाविद्योद्भूतहेतुफलावेशोऽपनीतो भवति तदा तस्मिन्क्षीणे नास्ति हेतुफलोद्भवः ॥ ५५ ॥
हेतु-फलके अभिनिवेशमें दोष
यदि हेतु और फल की उत्पत्ति रहे तो इनमें दोष क्या है? सो बतलाते हैं—
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यदि हेतुफलोद्भवस्तदा को दोष इत्युच्यते—