यावद्धेतुफलावेशः संसारस्तावदायतः ।
क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥ ५६ ॥
क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥ ५६ ॥
yāvaddhetuphalāveśaḥ saṃsārastāvadāyataḥ .
kṣīṇe hetuphalāveśe saṃsāraṃ na prapadyate .. 56 ..
जबतक हेतु और फल का आग्रह है तबतक संसार बढ़ा हुआ है । हेतु और फल का आवेश नष्ट होने पर विद्वान् संसार को प्राप्त नहीं होता ॥ ५६ ॥
जबतक सम्यग्ज्ञान से हेतु और फल का आग्रह निवृत्त नहीं होता तबतक संसार क्षीण न होकर विस्तृत होता जाता है । किन्तु हेतुफलावेश के क्षीण होने पर, कोई कारण न रहने से, विद्वान् संसार को प्राप्त नहीं होता ॥ ५६ ॥
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यावत्सम्यग्दर्शनेन हेतुफलावेशो न निवर्ततेऽक्षीणः संसारस्तावदायतो दीर्घो भवतीत्यर्थः । क्षीणे पुनर्हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते कारणाभावात् ॥ ५६ ॥
शंका—अजन्मा आत्मा से भिन्न तो और कोई है ही नहीं; फिर हेतु और फल तथा संसार के उत्पत्तिविनाश का तुम कैसे वर्णन कर रहे हो?
समाधान—अच्छा, सुनो—
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नन्वजादात्मनोऽन्यन्नास्त्येव तत्कथं हेतुफलयोः संसारस्य चोत्पत्तिविनाशावुच्येते त्वया?
शृणु—