अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 57

संवृत्या जायते सर्वं शाश्वतं नास्ति तेन वै ।
सद्भावेन ह्यजं सर्वमुच्छेदस्तेन नास्ति वै ॥ ५७ ॥

saṃvṛtyā jāyate sarvaṃ śāśvataṃ nāsti tena vai .
sadbhāvena hyajaṃ sarvamucchedastena nāsti vai .. 57 ..


सारे पदार्थ व्यावहारिक दृष्टि से उत्पन्न होते हैं; इसलिये वे नित्य नहीं हैं । परमार्थदृष्टि से तो सब कुछ अज ही है; इसलिये किसी का विनाश भी नहीं है ॥ ५७ ॥
‘संवृत्या’—संवरण अर्थात् अविद्याविषयक लौकिक व्यवहार का नाम संवृति है; उस संवृति से ही सबकी उत्पत्ति होती है । अतः उस अविद्या के अधिकार में कोई भी वस्तु शाश्वत—नित्य नहीं है । इसीलिये उत्पत्ति-विनाशशील संसार विस्तृत है—ऐसा कहा जाता है; क्योंकि परमार्थसत्ता से तो सब कुछ अजन्मा आत्मा ही है । अतः जन्म का अभाव होने के कारण किसी भी हेतु या फल आदि का उच्छेद नहीं होता—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ५७ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
संवृत्या संवरणं संवृतिरविद्याविषयो लौकिको व्यवहारस्तया संवृत्या जायते सर्वम् । तेनाविद्याविषये शाश्वतं नित्यं नास्ति वै । अत उत्पत्तिविनाशलक्षणः संसार आयत इत्युच्यते । परमार्थसद्भावेन त्वजं सर्वमात्मैव यस्मात् । अतो जात्यभावादुच्छेदस्तेन नास्ति वै कस्यचिद्धेतुफलादेरित्यर्थः ॥ ५७ ॥