अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 58

धर्मा य इति जायन्ते जायन्ते ते न तत्त्वतः ।
जन्म मायोपमं तेषां सा च माया न विद्यते ॥ ५८ ॥

dharmā ya iti jāyante jāyante te na tattvataḥ .
janma māyopamaṃ teṣāṃ sā ca māyā na vidyate .. 58 ..


धर्म (जीव) जो उत्पन्न होते कहे जाते हैं, वे वस्तुतः उत्पन्न नहीं होते । उनका जन्म माया के सदृश है और वह माया भी [वस्तुतः] है नहीं ॥ ५८ ॥

जो भी आत्मा तथा दूसरे धर्म ‘उत्पन्न होते हैं’—इस प्रकार कल्पना किये जाते हैं वे इस प्रकार के सभी धर्म संवृति से ही उत्पन्न होते हैं । यहाँ ‘इति’ शब्द से इससे पहले श्लोक में कही हुई संवृति का निर्देश किया गया है । वे तत्त्वतः—परमार्थतः उत्पन्न नहीं होते । क्योंकि उन पूर्वोक्त धर्मों का जो संवृति से होनेवाला जन्म है वह ऐसा है जैसे माया से होनेवाला जन्म होता है, इसलिये उसे माया के सदृश समझना चाहिये ।

तब तो माया एक सत्य वस्तु सिद्ध होती है? नहीं, ऐसी बात नहीं है । वह माया भी है नहीं । तात्पर्य यह है कि ‘माया’ यह अविद्यमान वस्तु का ही नाम है ॥ ५८ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

येऽप्यात्मानोऽन्ये च धर्मा जायन्त इति कल्प्यन्ते त इत्येवंप्रकारा यथोक्ता संवृतिर्निर्दिश्यत इति संवृत्यैव धर्मा जायन्ते; न ते तत्त्वतः परमार्थतो जायन्ते । यत्पुनस्तत्संवृत्या जन्म तेषां धर्माणां यथोक्तानां यथा मायया जन्म तथा तन्मायोपमं प्रत्येतव्यम् ।

माया नाम वस्तु तर्हि? नैवम्; सा च माया न विद्यते, मायेत्यविद्यमानस्याख्येत्यभिप्रायः ॥ ५८ ॥


उन धर्मों का जन्म माया के सदृश किस प्रकार है? सो बतलाते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कथं मायोपमं तेषां धर्माणां जन्मेत्याह—