अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 60

नाजेषु सर्वधर्मेषु शाश्वताशाश्वताभिधा ।
यत्र वर्णा न वर्तन्ते विवेकस्तत्र नोच्यते ॥ ६० ॥

nājeṣu sarvadharmeṣu śāśvatāśāśvatābhidhā .
yatra varṇā na vartante vivekastatra nocyate .. 60 ..


इन सम्पूर्ण अजन्मा धर्मों में नित्य-अनित्य नामों की प्रवृत्ति नहीं है, जहाँ शब्द ही नहीं है उस आत्मतत्त्व में [नित्य-अनित्य] विवेक भी नहीं कहा जा सकता ॥ ६० ॥
वास्तव में तो नित्य एकरस विज्ञानमात्र सत्तास्वरूप अजन्मा आत्माओं में नित्य-अनित्य—ऐसे अभिधान अर्थात् नाम की भी प्रवृत्ति नहीं है । जहाँ—जिन महात्माओं में—जिनसे पदार्थों का वर्णन किया जाता है वे वर्ण यानी शब्द भी नहीं हैं अर्थात् उसका वर्णन करने के लिये प्रवृत्त नहीं होते हैं, उसमें ‘यह ऐसा है’ अर्थात् नित्य है अथवा अनित्य है’ इस प्रकार का विवेक भी नहीं कहा जाता; जैसा कि “जहाँ से वाणी लौट आती है” इस श्रुति से सिद्ध होता है ॥ ६० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
परमार्थतस्त्वात्मस्वजेषु नित्यैकरसविज्ञप्तिमात्रसत्ताकेषु शाश्वतोऽशाश्वत इति वा नाभिधा नाभिधानं प्रवर्तत इत्यर्थः । यत्र येषु वर्ण्यन्ते यैरर्थास्ते वर्णाः शब्दा न प्रवर्तन्तेऽभिधातुं प्रकाशयितुं न प्रवर्तन्त इत्यर्थः । इदमेवमिति विवेको विविक्तता तत्र नित्योऽनित्य इति नोच्यते । “यतो वाचो निवर्तन्ते” (तै० उ० २ । ४ । १) इति श्रुतेः ॥ ६० ॥