अजातस्यैव धर्मस्य जातिमिच्छन्ति वादिनः ।
अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ ६ ॥
अजातो ह्यमृतो धर्मो मर्त्यतां कथमेष्यति ॥ ६ ॥
ajātasyaiva dharmasya jātimicchanti vādinaḥ .
ajāto hyamṛto dharmo martyatāṃ kathameṣyati .. 6 ..
ये वादीलोग अजात वस्तु का ही जन्म होना स्वीकार करते हैं । किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजात और अमृत है वह मरणशीलता को कैसे प्राप्त हो सकता है? ॥ ६ ॥
यहाँ [‘वादिनः’ पद से] सभी सद्वादी और असद्वादी अभिप्रेत हैं । इस श्लोक का भाष्य पहले[ * ] किया जा चुका है ॥ ६ ॥
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सदसद्वादिनः सर्वेऽपीति पुरस्तात्कृतभाष्यश्लोकः ॥ ६ ॥