अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 61

यथा स्वप्ने द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ।
तथा जाग्रद्द्वयाभासं चित्तं चलति मायया ॥ ६१ ॥

yathā svapne dvayābhāsaṃ cittaṃ calati māyayā .
tathā jāgraddvayābhāsaṃ cittaṃ calati māyayā .. 61 ..


जिस प्रकार स्वप्न में चित्त माया से द्वैताभासरूप से स्फुरित होता है, उसी प्रकार जाग्रत्कालीन द्वैताभासरूप से भी चित्त माया से ही स्फुरित होता है ॥ ६१ ॥