अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 62

अद्वयं च द्वयाभासं चित्तं स्वप्ने न संशयः ।
अद्वयं च द्वयाभासं तथा जाग्रन्न संशयः ॥ ६२ ॥

advayaṃ ca dvayābhāsaṃ cittaṃ svapne na saṃśayaḥ .
advayaṃ ca dvayābhāsaṃ tathā jāgranna saṃśayaḥ .. 62 ..


इसमें सन्देह नहीं, स्वप्नावस्था में अद्वय चित्त ही द्वैतरूप से भासनेवाला है; इसी प्रकार जाग्रत्काल में भी अद्वय मन ही द्वैतरूप से भासनेवाला है—इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६२ ॥
परमार्थतः अद्वय विज्ञानमात्र का जो वाणी का विषय होना है वह मन का स्फुरणमात्र ही है, वह परमार्थतः है नहीं—इस प्रकार इन श्लोकों की व्याख्या पहले (अद्वैत० २९-३० में) की जा चुकी है ॥ ६१-६२ ॥
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यत्पुनर्वाग्गोचरत्वं परमार्थतोऽद्वयस्य विज्ञानमात्रस्य तन्मनसः स्पन्दनमात्रं न परमार्थत इति । उक्तार्थौ श्लोकौ ॥ ६१-६२ ॥

द्वैताभाव में स्वप्न का दृष्टान्त

वाणी के विषयभूत द्वैत का इसलिये भी अभाव है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
इतश्च वाग्गोचरस्याभावो द्वैतस्य—