स्वप्नदृक्प्रचरन्स्वप्ने दिक्षु वै दशसु स्थितान् ।
अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्सदा ॥ ६३ ॥
अण्डजान्स्वेदजान्वापि जीवान्पश्यति यान्सदा ॥ ६३ ॥
svapnadṛkpracaransvapne dikṣu vai daśasu sthitān .
aṇḍajānsvedajānvāpi jīvānpaśyati yānsadā .. 63 ..
स्वप्नद्रष्टा स्वप्न में घूमते-घूमते दसों दिशाओं में स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवों को सर्वदा देखा करता है [वे वस्तुतः उससे पृथक् नहीं होते] ॥ ६३ ॥
जो स्वप्नों को देखता है उसे स्वप्नद्रष्टा कहते हैं, वह स्वप्न अर्थात् स्वप्नस्थानों में घूमता हुआ दसों दिशाओं में स्थित जिन स्वेदज अथवा अण्डज प्राणियों को सर्वदा देखता है [वे वस्तुतः उससे भिन्न नहीं होते] ॥ ६३ ॥
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स्वप्नान्पश्यतीति स्वप्नदृक्प्रचरन्पर्यटन्स्वप्ने स्वप्नस्थाने दिक्षु वै दशसु स्थितान्वर्तमानाञ्जीवान्प्राणिनोऽण्डजान्स्वेदजान्वा यान् सदा पश्यति ॥ ६३ ॥
यदि ऐसा है तो इससे सिद्ध क्या हुआ? सो बतलाते हैं—
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यद्येवं ततः किम्? उच्यते—