स्वप्नदृक्चित्तदृश्यास्ते न विद्यन्ते ततः पृथक् ।
तथा तद्दृश्यमेवेदं स्वप्नदृक्चित्तमिष्यते ॥ ६४ ॥
तथा तद्दृश्यमेवेदं स्वप्नदृक्चित्तमिष्यते ॥ ६४ ॥
svapnadṛkcittadṛśyāste na vidyante tataḥ pṛthak .
tathā taddṛśyamevedaṃ svapnadṛkcittamiṣyate .. 64 ..
वे सब स्वप्नद्रष्टा के चित्त के दृश्य उससे पृथक् नहीं होते । इसी प्रकार उस स्वप्नद्रष्टा का यह चित्त भी उसी का दृश्य माना जाता है ॥ ६४ ॥
स्वप्नद्रष्टा का चित्त ‘स्वप्नदृक्चित्त’ कहलाता है, उससे देखे जानेवाले वे जीव उस स्वप्नद्रष्टा के चित्त से पृथक् नहीं हैं—यह इसका तात्पर्य है । अनेक जीवादिभेदरूप से चित्त ही कल्पना किया जाता है । इसी प्रकार उस स्वप्नद्रष्टा का यह चित्त भी उसका दृश्य ही है । उस स्वप्नद्रष्टा से देखा जाता है, इसलिये उसका दृश्य है । अतः तात्पर्य यह है कि स्वप्नद्रष्टा से भिन्न चित्त भी कुछ है नहीं ॥ ६४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
स्वप्नदृशश्चित्तं स्वप्नदृक्चित्तम् । तेन दृश्यास्ते जीवास्ततस्तस्मात्स्वप्नदृक्चित्तात्पृथङ् न विद्यन्ते न सन्तीत्यर्थः । चित्तमेव ह्यनेकजीवादिभेदाकारेण विकल्प्यते । तथा तदपि स्वप्नदृक्चित्तमिदं तद्दृश्यमेव, तेन स्वप्नदृशा दृश्यं तद्दृश्यम् । अतः स्वप्नदृग्व्यतिरेकेण चित्तं नाम नास्तीत्यर्थः ॥ ६४ ॥