अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 66

जाग्रच्चित्तेक्षणीयास्ते न विद्यन्ते ततः पृथक् ।
तथा तद्दृश्यमेवेदं जाग्रतश्चित्तमिष्यते ॥ ६६ ॥

jāgraccittekṣaṇīyāste na vidyante tataḥ pṛthak .
tathā taddṛśyamevedaṃ jāgrataścittamiṣyate .. 66 ..


जाग्रत्-अवस्था में घूमते-घूमते जाग्रत्-अवस्था का साक्षी दसों दिशाओं में स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवों को सर्वदा देखता है ॥ ६५ ॥ वे जाग्रच्चित्त के दृश्य उससे पृथक् नहीं हैं । इसी प्रकार वह जाग्रच्चित्त भी उसी का दृश्य माना जाता है ॥ ६६ ॥
जाग्रत् पुरुष को दिखलायी देनेवाले जीव उसके चित्त से अपृथक् हैं, क्योंकि स्वप्नद्रष्टा के चित्त से देखे जानेवाले जीवों के समान वे उसके चित्त से ही देखे जाते हैं । तथा जीवों को देखनेवाला वह चित्त भी द्रष्टा से अभिन्न है, क्योंकि स्वप्नचित्त के समान वह भी जाग्रद्द्रष्टा का दृश्य है । शेष अर्थ पहले कहा जा चुका है ॥ ६५-६६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
जाग्रतो दृश्या जीवास्तच्चित्ताव्यतिरिक्ताश्चित्तेक्षणीयत्वात्स्वप्नदृक्चित्तेक्षणीयजीववत् । तच्च जीवेक्षणात्मकं चित्तं द्रष्टुरव्यतिरिक्तं द्रष्टृदृश्यत्वात्स्वप्नचित्तवत् । उक्तार्थमन्यत् ॥ ६५-६६ ॥