अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 67

उभे ह्यन्योन्यदृश्ये ते किं तदस्तीति नोच्यते ।
लक्षणाशून्यमुभयं तन्मतेनैव गृह्यते ॥ ६७ ॥

ubhe hyanyonyadṛśye te kiṃ tadastīti nocyate .
lakṣaṇāśūnyamubhayaṃ tanmatenaiva gṛhyate .. 67 ..


वे [जीव और चित्त] दोनों एक-दूसरे के दृश्य हैं; वे हैं क्या वस्तु—सो कहा नहीं जा सकता । वे दोनों ही प्रमाणशून्य हैं और केवल तच्चित्तता के कारण ही ग्रहण किये जाते हैं ॥ ६७ ॥

जीव और चित्त अर्थात् चित्त और चित्त के विषय—ये दोनों ही अन्योन्यदृश्य अर्थात् एक-दूसरे के विषय हैं । जीवादि विषय की अपेक्षा से चित्त है और चित्त की अपेक्षा से जीवादि दृश्य । अतः वे एक-दूसरे के दृश्य हैं । इसलिये ऐसा प्रश्न होने पर कि वे हैं क्या? विवेकी लोग यही कहते हैं कि चित्त अथवा चित्त का दृश्य—इनमें से कोई भी वस्तु है नहीं । इससे उन विवेकी पुरुषों का यही अभिप्राय है कि जिस प्रकार स्वप्न में हाथी और हाथी को ग्रहण करनेवाला चित्त नहीं होता उसी प्रकार यहाँ (जाग्रत्-अवस्था में) भी उनका अभाव है ।

किस प्रकार नहीं है? क्योंकि वे चित्त और चैत्य दोनों ही लक्षणाशून्य—प्रमाणरहित हैं । जिससे कोई पदार्थ लक्षित होता है उसे ‘लक्षणा’ यानी ‘प्रमाण’ कहते हैं । और वे तन्मत—तच्चित्तता से ही ग्रहण किये जाते हैं, क्योंकि न तो घटबुद्धि को त्यागकर घट का ही ग्रहण किया जाता है और न घट को त्यागकर घटबुद्धि का ही । तात्पर्य यह कि उनमें प्रमाण और प्रमेय के भेद की कल्पना नहीं की जा सकती ॥ ६७ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

जीवचित्ते उभे चित्तचैत्ये ते अन्योन्यदृश्ये इतरेतरगम्ये । जीवादिविषयापेक्षं हि चित्तं नाम भवति । चित्तापेक्षं हि जीवादि दृश्यम् । अतस्ते अन्योन्यदृश्ये । तस्मान्न किंचिदस्तीति चोच्यते चित्तं वा चित्तेक्षणीयं वा किं तदस्तीति विवेकिनोच्यते । न हि स्वप्ने हस्ती हस्तिचित्तं वा विद्यते तथेहापि विवेकिनामित्यभिप्रायः ।

कथम्? लक्षणाशून्यं लक्ष्यतेऽनयेति लक्षणा प्रमाणं प्रमाणशून्यमुभयं चित्तं चैत्यं द्वयं यतस्तन्मतेनैव तच्चित्ततयैव तद्गृह्यते । न हि घटमतिं प्रत्याख्याय घटो गृह्यते नापि घटं प्रत्याख्याय घटमतिः । न हि तत्र प्रमाणप्रमेयभेदः शक्यते कल्पयितुमित्यभिप्रायः ॥ ६७ ॥