अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 70

यथा निर्मितको जीवो जायते म्रियतेऽपि वा ।
तथा जीवा अमी सर्वे भवन्ति न भवन्ति च ॥ ७० ॥

yathā nirmitako jīvo jāyate mriyate’pi vā .
tathā jīvā amī sarve bhavanti na bhavanti ca .. 70 ..


जिस प्रकार मन्त्रादिसे रचा हुआ जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार ये सब जीव उत्पन्न होते हैं और मरते भी हैं ॥ ७० ॥
मायामय—जिसे मायावी ने रचा हो, निर्मितक—मन्त्र और औषधि आदि से सम्पादन किया हुआ । स्वप्न, माया और मन्त्रादि से निष्पन्न हुए अण्डज आदि जीव जिस प्रकार उत्पन्न होते और मरते भी हैं उसी प्रकार मनुष्यादिरूप जीव वर्तमान होते हुए भी चित्त के विकल्पमात्र ही हैं—यह इसका अभिप्राय है ॥ ६८—७० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
मायामयो मायाविना यः कृतो निर्मितको मन्त्रौषध्यादिभिर्निष्पादितः । स्वप्नमायानिर्मितका अण्डजादयो जीवा यथा जायन्ते म्रियन्ते च तथा मनुष्यादिलक्षणा अविद्यमाना एव चित्तविकल्पनामात्रा इत्यर्थः ॥ ६८—७० ॥