न कश्चिज्जायते जीवः सम्भवोऽस्य न विद्यते ।
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥ ७१ ॥
एतत्तदुत्तमं सत्यं यत्र किञ्चिन्न जायते ॥ ७१ ॥
na kaścijjāyate jīvaḥ sambhavo’sya na vidyate .
etattaduttamaṃ satyaṃ yatra kiñcinna jāyate .. 71 ..
[वस्तुतः] कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्म की सम्भावना ही नहीं है । उत्तम सत्य तो यही है कि जिसमें किसी वस्तु की उत्पत्ति ही नहीं होती ॥ ७१ ॥
व्यावहारिक सत्ता में भी जीवों के जो जन्म-मरणादि हैं वे स्वप्नादि के जीवों के ही समान हैं—ऐसा पहले कहा जा चुका है; किन्तु उत्तम सत्य तो यही है कि कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता । शेष अंश की व्याख्या पहले की जा चुकी है ॥ ७१ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
व्यवहारसत्यविषये जीवानां जन्ममरणादिः स्वप्नादिजीववदित्युक्तम् ।
उत्तमं तु परमार्थसत्यं न कश्चिज्जायते जीव इति । उक्तार्थमन्यत् ॥ ७१ ॥