चित्तस्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकवद्द्वयम् ।
चित्तं निर्विषयं नित्यमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥ ७२ ॥
चित्तं निर्विषयं नित्यमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥ ७२ ॥
cittaspanditamevedaṃ grāhyagrāhakavaddvayam .
cittaṃ nirviṣayaṃ nityamasaṅgaṃ tena kīrtitam .. 72 ..
विषय और इन्द्रियों के सहित यह सम्पूर्ण द्वैत चित्त का ही स्फुरण है; किन्तु चित्त निर्विषय है; इसीसे उसे नित्य असंग कहा गया है ॥ ७२ ॥
विषय और इन्द्रियों से युक्त सम्पूर्ण द्वैत चित्त का ही स्फुरण है । किन्तु चित्त परमार्थतः आत्मा ही है, इसलिये वह निर्विषय है । उस निर्विषयता के कारण उसे सर्वदा असंग कहा गया है; जैसा कि “यह पुरुष असंग ही है” इस श्रुति से प्रमाणित होता है । जो सविषय होता है उसीका अपने विषय से संग हो सकता है । अतः तात्पर्य यह है कि निर्विषय होने के कारण चित्त असंग है ॥ ७२ ॥
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सर्वं ग्राह्यग्राहकवच्चित्तस्पन्दितमेव द्वयं चित्तं परमार्थत आत्मैवेति निर्विषयं तेन निर्विषयत्वेन नित्यमसङ्गं कीर्तितम् । “असङ्गो ह्ययं पुरुषः” (बृ० उ० ४ ।३ ।१५, १६) इति श्रुतेः । सविषयस्य हि विषये सङ्गः । निर्विषयत्वाच्चित्तमसङ्गमित्यर्थः ॥ ७२ ॥
शंका—यदि निर्विषयता के कारण ही असंगता होती है तो चित्त की असंगता तो हो नहीं सकती, क्योंकि शास्ता (गुरु), शास्त्र और शिष्य इत्यादि उसके विषय विद्यमान हैं ।
समाधान—यह दोष नहीं हो सकता, क्योंकि—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ननु निर्विषयत्वेन चेदसङ्गत्वं चित्तस्य न निःसङ्गता भवति यस्माच्छास्ता शास्त्रं शिष्यश्चेत्येवमादेर्विषयस्य विद्यमानत्वात् ।
नैष दोषः; कस्मात्—