अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 73

योऽस्ति कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नास्त्यसौ ।
परतन्त्राभिसंवृत्या स्यान्नास्ति परमार्थतः ॥ ७३ ॥

yo’sti kalpitasaṃvṛtyā paramārthena nāstyasau .
paratantrābhisaṃvṛtyā syānnāsti paramārthataḥ .. 73 ..


जो पदार्थ कल्पित व्यवहार के कारण होता है वह परमार्थतः नहीं होता; और यदि अन्य मतावलम्बियों के शास्त्रों की परिभाषा के अनुसार हो भी तो भी वह परमार्थतः नहीं हो सकता ॥ ७३ ॥

जो भी शास्त्रादि पदार्थ हैं वे कल्पित व्यवहार से ही हैं; अर्थात् जिस व्यवहार की परमार्थतत्त्व की उपलब्धि के उपायरूप से कल्पना की गयी है उसके कारण जिस पदार्थ की सत्ता है वह परमार्थ से नहीं है । “ज्ञान हो जाने पर द्वैत नहीं रहता” (आगम० श्लो० १८) ऐसा हम पहले कह ही चुके हैं ।

इसके सिवा जो पदार्थ परतन्त्रादिसंवृति से—अन्य मतावलम्बियों के शास्त्रव्यवहार से सिद्ध है वह परमार्थतः निरूपण किये जाने पर नहीं है । अतः ‘इसीसे उसे असङ्ग कहा गया है’—यह कथन ठीक ही है ॥ ७३ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

यः पदार्थः शास्त्रादिर्विद्यते स कल्पितसंवृत्या; कल्पिता च सा परमार्थप्रतिपत्त्युपायत्वेन संवृतिश्च सा, तया योऽस्ति परमार्थेन नास्त्यसौ न विद्यते । ज्ञाते द्वैतं न विद्यत इत्युक्तम् ।

यश्च परतन्त्राभिसंवृत्या परशास्त्रव्यवहारेण स्यात्पदार्थः स परमार्थतो निरूप्यमाणो नास्त्येव । तेन युक्तमुक्तमसङ्गं तेन कीर्तितमिति ॥ ७३ ॥


आत्मा अज है—यह कल्पना भी व्यावहारिक है

शंका—शास्त्रादि को व्यावहारिक मानने पर तो ‘अज है’ ऐसी कल्पना भी व्यावहारिक ही सिद्ध होगी?

समाधान—हाँ, बात तो ऐसी ही है ।

संस्कृत भाष्य पढ़ें

ननु शास्त्रादीनां संवृतित्वेऽज इतीयमपि कल्पना संवृतिः स्यात्?

सत्यमेवम् ।