अजः कल्पितसंवृत्या परमार्थेन नाप्यजः ।
परतन्त्राभिनिष्पत्त्या संवृत्या जायते तु सः ॥ ७४ ॥
परतन्त्राभिनिष्पत्त्या संवृत्या जायते तु सः ॥ ७४ ॥
ajaḥ kalpitasaṃvṛtyā paramārthena nāpyajaḥ .
paratantrābhiniṣpattyā saṃvṛtyā jāyate tu saḥ .. 74 ..
आत्मा ‘अज’ भी कल्पित व्यवहार के कारण ही कहा जाता है, परमार्थतः तो ‘अज’ भी नहीं है । अन्य मतावलम्बियों के शास्त्रों से सिद्ध जो संवृति (भ्रमजनित व्यवहार) है उसके अनुसार उसका जन्म होता है । [अतः उसका निषेध करने के लिये ही उसे ‘अज’ कहा गया है] ॥ ७४ ॥
शास्त्रादिकल्पित व्यवहार के कारण ही उसे ‘अज’ ऐसा कहा जाता है । परमार्थतः तो वह अज भी नहीं है । क्योंकि यहाँ जिसे अन्य शास्त्रों की सिद्धि की अपेक्षा से ‘अज’ ऐसा कहा है, वह संवृति से ही जन्म भी लेता है । अतः ‘वह अज है’ ऐसी कल्पना का भी परमार्थराज्य में प्रवेश नहीं हो सकता ॥ ७४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
शास्त्रादिकल्पितसंवृत्यैवाज इत्युच्यते । परमार्थेन नाप्यजः । यस्मात्परतन्त्राभिनिष्पत्त्या परशास्त्रसिद्धिमपेक्ष्य योऽज इत्युक्तः स संवृत्या जायते । अतोऽज इतीयमपि कल्पना परमार्थविषये नैव क्रमत इत्यर्थः ॥ ७४ ॥
द्वैताभाव से जन्माभाव
क्योंकि विषय असत् है, इसलिये—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्मादसद्विषयस्तस्मात्—