अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 75

अभूताभिनिवेशोऽस्ति द्वयं तत्र न विद्यते ।
द्वयाभावं स बुद्ध्वैव निर्निमित्तो न जायते ॥ ७५ ॥

abhūtābhiniveśo’sti dvayaṃ tatra na vidyate .
dvayābhāvaṃ sa buddhvaiva nirnimitto na jāyate .. 75 ..


लोगों का असत्य [द्वैत]-के विषय में केवल आग्रह है । वहाँ [परमार्थतत्त्व में] द्वैत है ही नहीं । जीव द्वैताभाव का बोध प्राप्त करके ही, फिर कोई कारण न रहने से जन्म नहीं लेता ॥ ७५ ॥
असत्यभूत द्वैत में लोगों का केवल अभिनिवेश है । आग्रहमात्र का नाम अभिनिवेश है । वहाँ [परमार्थवस्तु में] द्वैत है ही नहीं । क्योंकि मिथ्या अभिनिवेशमात्र ही जीव के जन्म का कारण है । अतः द्वैताभाव को जानकर जो निर्निमित्त हो गया है, अर्थात् जिसका मिथ्या द्वैतविषयक आग्रह निवृत्त हो गया है उस [अधिकारी जीव]-का फिर जन्म नहीं होता ॥ ७५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
असत्यभूते द्वैतेऽभिनिवेशोऽस्ति मिथ्याभिनिवेश- केवलम् । अभिनिवेश निवृत्त्या आग्रहमात्रम् । द्वयं तत्र जन्माभावः न विद्यते । मिथ्याभि- निवेशमात्रं च जन्मनः कारणं यस्मात्तस्माद्द्वयाभावं बुद्ध्वा निर्निमित्तो निवृत्तमिथ्याद्वयाभिनिवेशो यः स न जायते ॥ ७५ ॥