अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 76

यदा न लभते हेतूनुत्तमाधममध्यमान् ।
तदा न जायते चित्तं हेत्वभावे फलं कुतः ॥ ७६ ॥

yadā na labhate hetūnuttamādhamamadhyamān .
tadā na jāyate cittaṃ hetvabhāve phalaṃ kutaḥ .. 76 ..


जिस समय चित्त उत्तम, मध्यम और अधम हेतुओं को प्राप्त नहीं करता उस समय उसका जन्म भी नहीं होता; क्योंकि हेतु का अभाव होने पर फिर फल कहाँ हो सकता है? ॥ ७६ ॥
निष्काम मनुष्यों द्वारा अनुष्ठान किये जाते हुए देवत्वादि की प्राप्ति के हेतुभूत वर्णाश्रमविहित धर्म, जो केवल धर्म ही हैं, उत्तम हेतु हैं और मनुष्यत्वादि की प्राप्ति के हेतुभूत जो अधर्ममिश्रित धर्म हैं वे मध्यम हेतु हैं तथा तिर्यगादि योनियों की प्राप्ति की हेतुभूत अधर्ममयी विशेष प्रवृत्तियाँ अधम हेतु हैं । जिस समय सम्पूर्ण कल्पना से रहित एकमात्र अद्वितीय आत्मतत्त्व का ज्ञान होने पर उन उत्तम, मध्यम और अधम हेतुओं को मनुष्य इस प्रकार उपलब्ध नहीं करता, जैसे कि विवेकी पुरुष आकाश में बालकों को दिखायी देनेवाली मलिनता को नहीं देखता, उस समय चित्त उत्तम, मध्यम और अधम फलरूप से देवादिशरीरों में उत्पन्न नहीं होता । बीजादि के अभाव में जैसे अन्नादि उत्पन्न नहीं होते उसी प्रकार हेतु के न होने पर फल की भी उत्पत्ति नहीं होती ॥ ७६ ॥
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हेतुत्रयाभावा- जन्माभावः जात्याश्रमविहिता आशीर्वर्जितैरनुष्ठीयमाना धर्मा देवत्वादिप्राप्तिहेतव उत्तमाः केवलाश्च धर्माः । अधर्मव्यामिश्रा मनुष्यत्वादिप्राप्त्यर्था मध्यमाः । तिर्यगादिप्राप्तिनिमित्ता अधर्मलक्षणाः प्रवृत्तिविशेषाश्चाधमाः । तानुत्तममध्यमाधमानविद्यापरिकल्पितान्यदैकमेवाद्वितीयमात्मतत्त्वं सर्वकल्पनावर्जितं जानन्न लभते न पश्यति यथा बालैर्दृश्यमानं गगने मलं विवेकी न पश्यति तद्वत्तदा न जायते नोत्पद्यते चित्तं देवाद्याकारैरुत्तमाधममध्यमफलरूपेण । न ह्यसति हेतौ फलमुत्पद्यते बीजाद्यभाव इव सस्यादि ॥ ७६ ॥

हेतु का अभाव हो जाने पर चित्त उत्पन्न नहीं होता—ऐसा पहले कहा गया । किन्तु वह चित्त की अनुत्पत्ति कैसी होती है? इस पर कहा जाता है—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
हेत्वभावे चित्तं नोत्पद्यत इति ह्युक्तम् । सा पुनरनुत्पत्तिश्चित्तस्य कीदृशीत्युच्यते—