अनिमित्तस्य चित्तस्य यानुत्पत्तिः समाद्वया ।
अजातस्यैव सर्वस्य चित्तदृश्यं हि तद्यतः ॥ ७७ ॥
अजातस्यैव सर्वस्य चित्तदृश्यं हि तद्यतः ॥ ७७ ॥
animittasya cittasya yānutpattiḥ samādvayā .
ajātasyaiva sarvasya cittadṛśyaṃ hi tadyataḥ .. 77 ..
[इस प्रकार] निमित्तशून्य चित्त की जो अनुत्पत्ति है वह सर्वथा निर्विशेष और अद्वितीय है । [क्योंकि पहले भी] वह सर्वदा अजात [अर्थात् अद्वितीय] चित्त की ही होती है, क्योंकि यह जो कुछ [प्रतीयमान द्वैतवर्ग] है, सब चित्त का ही दृश्य है ॥ ७७ ॥
परमार्थज्ञान के द्वारा जिसका धर्माधर्मरूप उत्पत्ति का कारण निवृत्त हो गया है उस निमित्तशून्य चित्त की जो मोक्षसंज्ञक अनुत्पत्ति है वह सर्वदा सब अवस्थाओं में समान अर्थात् निर्विशेष और अद्वितीय है । वह पहले से ही अजातअनुत्पन्न और सर्व अर्थात् अद्वय चित्त की ही होती है । क्योंकि बोध होने के पूर्व भी वह द्वैत और जन्म चित्त का ही दृश्य था, अतः सम्पूर्ण अजात चित्त की अनुत्पत्ति सर्वदा समान और अद्वय ही होती है । ऐसी नहीं है कि कभी होती है और कभी नहीं होती । तात्पर्य यह है कि वह सर्वदा एकरूपा ही है ॥ ७७ ॥
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परमार्थदर्शनेन निरस्तधर्माधर्माख्योत्पत्तिनिमित्तस्यानिमित्तस्य चित्तस्येति या मोक्षाख्यानुत्पत्तिः सा सर्वदा सर्वावस्थासु समा निर्विशेषाद्वया च । पूर्वमप्यजातस्यैवानुत्पन्नस्य चित्तस्य सर्वस्याद्वयस्येत्यर्थः । यस्मात्प्रागपि विज्ञानाच्चित्तदृश्यं तद्द्वयं जन्म च तस्मादजातस्य सर्वस्य सर्वदा चित्तस्य समाद्वयैवानुत्पत्तिर्न पुनः कदाचिद्भवति कदाचिद्वा न भवति । सर्वदैकरूपैवेत्यर्थः ॥ ७७ ॥
विद्वान् की अभयपदप्राप्ति
उपर्युक्त न्याय से जन्म के हेतुभूत द्वैत का अभाव होने के कारण—
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यथोक्तेन न्यायेन जन्मनिमित्तस्य द्वयस्याभावात्—