अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 78

बुद्ध्वानिमित्ततां सत्यां हेतुं पृथगनाप्नुवन् ।
वीतशोकं तथाकाममभयं पदमश्नुते ॥ ७८ ॥

buddhvānimittatāṃ satyāṃ hetuṃ pṛthaganāpnuvan .
vītaśokaṃ tathākāmamabhayaṃ padamaśnute .. 78 ..


अनिमित्तता को ही सत्य जानकर और [देवादि योनि की प्राप्ति के] किसी अन्य हेतु को न पाकर विद्वान् शोक और काम से रहित अभयपद प्राप्त कर लेता है ॥ ७८ ॥
अनिमित्तता को ही सत्य यानी परमार्थरूप जानकर तथा देवादि योनियों की प्राप्ति के लिये किसी अन्य धर्मादि कारण को न पाकर [विद्वान्] बाह्य एषणाओं से मुक्त हो कामना एवं शोकादि से रहित अविद्याशून्य अभयपद को प्राप्त कर लेता है; अर्थात् फिर जन्म नहीं लेता ॥ ७८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अनिमित्ततां च सत्यां परमार्थरूपां बुद्ध्वा हेतुं धर्मादिकारणं देवादियोनिप्राप्तये पृथगनाप्नुवन्ननुपादानस्त्यक्तबाह्यैषणः सन्कामशोकादिवर्जितमविद्यादिरहितमभयं पदमश्नुते पुनर्न जायत इत्यर्थः ॥ ७८ ॥