अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 79

अभूताभिनिवेशाद्धि सदृशे तत्प्रवर्तते ।
वस्त्वभावं स बुद्ध्वैव निःसङ्गं विनिवर्तते ॥ ७९ ॥

abhūtābhiniveśāddhi sadṛśe tatpravartate .
vastvabhāvaṃ sa buddhvaiva niḥsaṅgaṃ vinivartate .. 79 ..


चित्त असत्य [द्वैत]-के अभिनिवेश से ही तदनुरूप विषयों में प्रवृत्त होता है । तथा द्वैत वस्तु के अभाव का बोध होने पर ही वह उससे निःसंग होकर लौट आता है ॥ ७९ ॥
क्योंकि अभूताभिनिवेश से जो द्वैत वस्तुतः असत् है उसके अस्तित्व का निश्चय करना ‘अभूताभिनिवेश’ है— उस अविद्याजनित मोहरूप असत्याभिनिवेश के कारण ही चित्त तदनुरूप विषयों में प्रवृत्त होता है । जिस समय वह उस द्वैत वस्तु का अभाव जान लेता है उस समय उस मिथ्या अभिनिवेशजनित विषय से निःसंग-निरपेक्ष होकर लौट आता है ॥ ७९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्मादभूताभिनिवेशादसति द्वये द्वयास्तित्वनिश्चयोऽभूताभिनिवेशस्तस्मादविद्याव्यामोहरूपाद्धि सदृशे तदनुरूपे तच्चित्तं प्रवर्तते । तस्य द्वयस्य वस्तुनोऽभावं यदा बुद्धवांस्तदा तस्मान्निःसङ्गं निरपेक्षं सद्विनिवर्ततेऽभूताभिनिवेशविषयात् ॥ ७९ ॥