अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 80

निवृत्तस्याप्रवृत्तस्य निश्चला हि तदा स्थितिः ।
विषयः स हि बुद्धानां तत्साम्यमजमद्वयम् ॥ ८० ॥

nivṛttasyāpravṛttasya niścalā hi tadā sthitiḥ .
viṣayaḥ sa hi buddhānāṃ tatsāmyamajamadvayam .. 80 ..


इस प्रकार [द्वैत से] निवृत्त और [विषयान्तर में] प्रवृत्त न हुए चित्त की उस समय निश्चल स्थिति रहती है । वह परमार्थदर्शी पुरुषों का ही विषय है और वही परम साम्य, अज और अद्वय है ॥ ८० ॥
उस समय द्वैतविषय से निवृत्त और विषयान्तर में अप्रवृत्त चित्त की अभावदर्शन के कारण निश्चल— चलनवर्जिता अर्थात् ब्रह्मस्वरूपा स्थिति रहती है । चित्त की जो यह अद्वयविज्ञानैकरसघनस्वरूपा ब्रह्ममयी स्थिति है वह, क्योंकि परमार्थदर्शी ज्ञानियों का विषय-गोचर है इसलिये, परम साम्य—निर्विशेष अज और अद्वय है ॥ ८० ॥
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निवृत्तस्य द्वैतविषयाद्विषयान्तरे चाप्रवृत्तस्याभावदर्शनेन चित्तस्य निश्चला चलनवर्जिता ब्रह्मस्वरूपैव तदा स्थितिः । यैषा ब्रह्मस्वरूपा स्थितिश्चित्तस्याद्वयविज्ञानैकरसघनलक्षणा, स हि यस्माद्विषयो गोचरः परमार्थदर्शिनां बुद्धानां तस्मात्तत्साम्यं परं निर्विशेषमजमद्वयं च ॥ ८० ॥

वह ज्ञानियों का विषय किस प्रकार का है? सो फिर भी बतलाते हैं—
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पुनरपि कीदृशश्चासौ बुद्धानां विषय इत्याह—