स्वभावेनामृतो यस्य धर्मो गच्छति मर्त्यताम् ।
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ ८ ॥
कृतकेनामृतस्तस्य कथं स्थास्यति निश्चलः ॥ ८ ॥
svabhāvenāmṛto yasya dharmo gacchati martyatām .
kṛtakenāmṛtastasya kathaṃ sthāsyati niścalaḥ .. 8 ..
जिसके मत में स्वभाव से ही मरणहीन धर्म मरणशीलता को प्राप्त हो जाता है; उसके सिद्धान्तानुसार कृतक (जन्म) होने के कारण वह अमृत पदार्थ निश्चल (चिरस्थायी) कैसे रह सकेगा? ॥ ८ ॥
जिनका अर्थ पहले कहा जा चुका है ऐसे उपर्युक्त [तीन] श्लोकों का उल्लेख यहाँ विपक्षी वादियों के पक्षों के पारस्परिक विरोध से प्रकाशित अजाति का अनुमोदन प्रदर्शित करने के लिये किया गया है ॥ ७-८ ॥
[ * ]: देखिये अद्वैतप्रकरण श्लोक २० का अर्थ ।
संस्कृत भाष्य पढ़ें
उक्तार्थानां श्लोकानामिहोपन्यासः परवादिपक्षाणामन्योन्यविरोधख्यापितानुत्पत्त्यनुमोदनप्रदर्शनार्थः ॥ ७-८ ॥
क्योंकि लौकिक प्रकृति का भी विपर्यय नहीं होता [फिर पारमार्थिकी का तो कैसे होगा? ] किन्तु वह प्रकृति है क्या? इसपर कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्माल्लौकिक्यपि प्रकृतिर्न विपर्येति, कासावित्याह—