अजमनिद्रमस्वप्नं प्रभातं भवति स्वयम् ।
सकृद्विभातो ह्येवैष धर्मो धातुस्वभावतः ॥ ८१ ॥
सकृद्विभातो ह्येवैष धर्मो धातुस्वभावतः ॥ ८१ ॥
ajamanidramasvapnaṃ prabhātaṃ bhavati svayam .
sakṛdvibhāto hyevaiṣa dharmo dhātusvabhāvataḥ .. 81 ..
वह अज, अनिद्र, अस्वप्न और स्वयंप्रकाश है । यह [आत्मा नामक] धर्म अपने वस्तुस्वभाव से ही नित्यप्रकाशमान है ॥ ८१ ॥
वह स्वयं ही प्रकाशित होता है—आदित्य आदि की अपेक्षा से नहीं, अर्थात् वह स्वयं प्रकाशस्वभाव है । यह ऐसे लक्षणोंवाला आत्मा नामक धर्म धातुस्वभाव—वस्तुस्वभाव से ही सकृद्विभात सदा भासमान है ॥ ८१ ॥
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स्वयमेव तत्प्रभातं भवति, नादित्याद्यपेक्षम्; स्वयंज्योतिःस्वभावमित्यर्थः । सकृद्विभातः सदैव विभात इत्येतदेष एवं लक्षण आत्माख्यो धर्मो धातुस्वभावतो वस्तुस्वभावत इत्यर्थः ॥ ८१ ॥
आत्मा की दुर्दर्शता का हेतु
इस प्रकार कहे जाने पर भी लौकिक पुरुषों को इस परमार्थतत्त्व का बोध क्यों नहीं होता? इस पर कहते हैं—
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एवमुच्यमानमपि परमार्थतत्त्वं कस्माल्लौकिकैर्न गृह्यत इत्युच्यते—