सुखमाव्रियते नित्यं दुःखं विव्रियते सदा ।
यस्य कस्य च धर्मस्य ग्रहेण भगवानसौ ॥ ८२ ॥
यस्य कस्य च धर्मस्य ग्रहेण भगवानसौ ॥ ८२ ॥
sukhamāvriyate nityaṃ duḥkhaṃ vivriyate sadā .
yasya kasya ca dharmasya graheṇa bhagavānasau .. 82 ..
वे भगवान् जिस-तिस द्वैत वस्तु के आग्रह से अनायास ही आच्छादित हो जाते हैं और सदा कठिनता से प्रकट होते हैं ॥ ८२ ॥
क्योंकि जिस-तिस धर्म—द्वैत वस्तु के ग्रहण—आग्रह से मिथ्याभिनिवेश के कारण वे भगवान् अर्थात् अद्वय आत्मदेव सहज ही आवृत हो जाते हैं, अर्थात् बिना आयास के ही आच्छादित हो जाते हैं—क्योंकि द्वैतोपलब्धि के निमित्त से होनेवाला आवरण किसी अन्य यत्न की अपेक्षा नहीं करता—और परमार्थज्ञान दुर्लभ होने के कारण दुःख से प्रकट किये जाते हैं; इसलिये वेदान्ताचार्यों के अनेक प्रकार निरूपण करने पर भी जानने में नहीं आ सकते—यह इसका तात्पर्य है । “इसका वर्णन करनेवाला आश्चर्यरूप है तथा इसे ग्रहण करनेवाला भी कोई निपुण पुरुष ही होता है” इस श्रुति से भी यही सिद्ध होता है ॥ ८२ ॥
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यस्माद्यस्य कस्यचिद्द्वयवस्तुनो धर्मस्य ग्रहेण ग्रहणावेशेन मिथ्याभिनिविष्टतया सुखमाव्रियतेऽनायासेनाच्छाद्यत इत्यर्थः । द्वयोपलब्धिनिमित्तं हि तत्रावरणं न यत्नान्तरमपेक्षते । दुःखं च विव्रियते प्रकटीक्रियते, परमार्थज्ञानस्य दुर्लभत्वात् । भगवानसावात्माद्वयो देव इत्यर्थः, अतो वेदान्तैराचार्यैश्च बहुश उच्यमानोऽपि नैव ज्ञातुं शक्य इत्यर्थः । “आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा” (क० उ० १ । २ । ७) इति श्रुतेः ॥ ८२ ॥
परमार्थ का आवरण करनेवाले असदभिनिवेश
अस्ति-नास्ति इत्यादि सूक्ष्मविषय भी, जो पण्डितों के आग्रह हैं, भगवान् परमात्मा के आवरण ही हैं, फिर मूर्ख लोगों के बुद्धिरूप आग्रहों की तो बात ही क्या है? इसी बात को दिखलाते हुए कहते हैं—
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अस्ति नास्तीत्यादिसूक्ष्मविषया अपि पण्डितानां ग्रहा भगवतः परमात्मन आवरणा एव किमुत मूढजनानां बुद्धिलक्षणा इत्येवमर्थं प्रदर्शयन्नाह—