अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 83

अस्ति नास्त्यस्ति नास्तीति नास्ति नास्तीति वा पुनः ।
चलस्थिरोभयाभावैरावृणोत्येव बालिशः ॥ ८३ ॥

asti nāstyasti nāstīti nāsti nāstīti vā punaḥ .
calasthirobhayābhāvairāvṛṇotyeva bāliśaḥ .. 83 ..


आत्मा है, नहीं है, है भी और नहीं भी है तथा नहीं है—नहीं है—इस प्रकार क्रमशः चल, स्थिर, उभयरूप और अभावरूप कोटियों से मूर्खलोग परमात्मा को आच्छादित ही करते हैं ॥ ८३ ॥

कोई वादी कहता है—‘आत्मा है’ । दूसरा वैनाशिक कहता है—‘नहीं है’ । तीसरा अर्द्धवैनाशिक सदसद्वादी दिगम्बर कहता है—‘है भी और नहीं भी है’ । तथा अत्यन्त शून्यवाद का कथन है कि ‘नहीं है—नहीं है’ । इनमें अस्तिभाव ‘चल’ है, क्योंकि वह घट आदि अनित्य पदार्थों से भिन्न है । [तात्पर्य यह है कि घटादि का प्रमाता सुखादि विशेष धर्मों से युक्त होने के कारण परिणामी—चल है ।] सदा अविशेषरूप होने से नास्तिभाव ‘स्थिर’ है । चल और स्थिरविषयक होने से सदसद्भाव उभयरूप है तथा अभाव अत्यन्ताभावरूप है ।

इन चल, स्थिर, चलस्थिर और अभावरूप चार प्रकार के भावों से सभी मूर्ख अर्थात् विवेकहीन सदसदादिवादीगण भगवान् को आच्छादित ही करते हैं । वे यद्यपि पण्डित हैं, तो भी परमार्थतत्त्व का ज्ञान न होने के कारण मूर्ख ही हैं । अतः तात्पर्य यह है कि फिर स्वभाव से ही मूर्ख लोगों की तो बात ही क्या है? ॥ ८३ ॥

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अस्त्यात्मेति वादी कश्चित्प्रतिपद्यते । नास्तीत्यपरो वैनाशिकः । अस्ति नास्तीत्यपरोऽर्धवैनाशिकः सदसद्वादी दिग्वासाः । नास्ति नास्तीत्यत्यन्तशून्यवादी । तत्रास्तिभावश्चलः, घटाद्यनित्यविलक्षणत्वात् । नास्तिभावः स्थिरः सदाविशेषत्वात् । उभयं चलस्थिरविषयत्वात्सदसद्भावोऽभावोऽत्यन्ताभावः ।

प्रकारचतुष्टयस्यापि तैरेतैश्चलस्थिरोभयाभावैः सदसदादिवादी सर्वोऽपि भगवन्तमावृणोत्येव बालिशोऽविवेकी । यद्यपि पण्डितो बालिश एव परमार्थतत्त्वानवबोधात्किमु स्वभावमूढो जन इत्यभिप्रायः ॥ ८३ ॥


तो फिर वह परमार्थतत्त्व कैसा है जिसका ज्ञान होने पर मनुष्य अबालिश अर्थात् पण्डित हो जाता है? इसपर कहते हैं—
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कीदृक्पुनः परमार्थतत्त्वं यदवबोधादबालिशः पण्डितो भवतीत्याह—