कोट्यश्चतस्र एतास्तु ग्रहैर्यासां सदावृतः ।
भगवानाभिरस्पृष्टो येन दृष्टः स सर्वदृक् ॥ ८४ ॥
भगवानाभिरस्पृष्टो येन दृष्टः स सर्वदृक् ॥ ८४ ॥
koṭyaścatasra etāstu grahairyāsāṃ sadāvṛtaḥ .
bhagavānābhiraspṛṣṭo yena dṛṣṭaḥ sa sarvadṛk .. 84 ..
जिनके अभिनिवेश से आत्मा सदा ही आवृत रहता है वे ये चार ही कोटियाँ हैं । इनसे असंसृष्ट (अछूते) भगवान् को जिसने देखा है वही सर्वज्ञ है ॥ ८४ ॥
उन प्रवाद करनेवाले वादियों के शास्त्रों द्वारा निर्णय की हुई ये अस्ति-नास्ति आदि चार ही कोटियाँ हैं । जिन कोटियों के ग्रह—ग्रहण से ही, अर्थात् उन प्रावादुकों के इस उपलब्धिजनित निश्चय से ही जो भगवान् सदा आवृत है उसे जिस मुनि ने इन अस्ति-नास्ति आदि चारों ही कोटियों से असंसृष्ट अर्थात् अस्ति-नास्ति आदि विकल्प से सर्वदा रहित देखा है, यानी उसे वेदान्तों में [प्रतिपादित] औपनिषद पुरुषरूप से जाना है वही सर्वदृक्सर्वज्ञ अर्थात् परमार्थ को जाननेवाला है ॥ ८४ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
कोट्यः प्रावादुकशास्त्रचतुष्कोटिवर्जितात्म- निर्णयान्ता एता ज्ञानस्य उक्ता अस्ति सार्वज्ञ्यकारणत्वम् नास्तीत्याद्याश्चतस्रो यासां कोटीनां ग्रहैर्ग्रहणैरुपलब्धिनिश्चयैः सदा सर्वदावृत आच्छादितस्तेषामेव प्रावादुकानां यः स भगवानाभिरस्तिनास्तीत्यादिकोटिभिश्चतसृभिरप्यस्पृष्टोऽस्त्यादिविकल्पनावर्जित इत्येतद्येन मुनिना दृष्टो ज्ञातो वेदान्तेष्वौपनिषदः पुरुषः स सर्वदृक्सर्वज्ञः परमार्थपण्डित इत्यर्थः ॥ ८४ ॥