प्राप्य सर्वज्ञतां कृत्स्नां ब्राह्मण्यं पदमद्वयम् ।
अनापन्नादिमध्यान्तं किमतः परमीहते ॥ ८५ ॥
अनापन्नादिमध्यान्तं किमतः परमीहते ॥ ८५ ॥
prāpya sarvajñatāṃ kṛtsnāṃ brāhmaṇyaṃ padamadvayam .
anāpannādimadhyāntaṃ kimataḥ paramīhate .. 85 ..
इस पूर्ण सर्वज्ञता और आदि, मध्य एवं अन्तसे रहित अद्वितीय ब्राह्मण्य पदको पाकर भी क्या [वह विवेकी पुरुष] फिर कोई चेष्टा करता है? ॥ ८५ ॥
इस उपर्युक्त सम्पूर्ण सर्वज्ञता और “[जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे जाता है] वह ब्राह्मण है” “यह ब्राह्मणकी शाश्वती महिमा है” इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार ब्राह्मण्यपदको प्राप्तकर—जिस अद्वय पदके आदि, मध्य और अन्त, अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति और लय अनापन्न—अप्राप्त हैं अर्थात् नहीं हैं, वह अनापन्नादिमध्यान्त ब्राह्मण्यपद है, उसीको पाकर इससे पीछे—इस आत्मलाभके अनन्तर कोई प्रयोजन न रहनेपर भी क्या [वह विद्वान्] कोई चेष्टा करता है? [अर्थात् नहीं करता] जैसा कि “उसका किसी कार्यसे प्रयोजन नहीं रहता” इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है ॥ ८५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
प्राप्यैतां यथोक्तां कृत्स्नां समस्तां सर्वज्ञतां ब्राह्मण्यं पदं “स ब्राह्मणः” (बृ० उ० ३ । ८ । १०) “एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य” (बृ० उ० ४ । ४ । २३) इति श्रुतेः; आदिमध्यान्ता उत्पत्तिस्थितिलया अनापन्ना अप्राप्ता यस्याद्वयस्य पदस्य न विद्यन्ते तदनापन्नादिमध्यान्तं ब्राह्मण्यं पदम्, तदेव प्राप्य लब्ध्वा किमतः परमस्मादात्मलाभादूर्ध्वमीहते चेष्टते निष्प्रयोजनमित्यर्थः । “नैव तस्य कृतेनार्थः” (गीता ३ । १८) इत्यादिस्मृतेः ॥ ८५ ॥