विप्राणां विनयो ह्येष शमः प्राकृत उच्यते ।
दमः प्रकृतिदान्तत्वादेवं विद्वाञ्शमं व्रजेत् ॥ ८६ ॥
दमः प्रकृतिदान्तत्वादेवं विद्वाञ्शमं व्रजेत् ॥ ८६ ॥
viprāṇāṃ vinayo hyeṣa śamaḥ prākṛta ucyate .
damaḥ prakṛtidāntatvādevaṃ vidvāñśamaṃ vrajet .. 86 ..
[आत्मस्वरूपमें स्थित रहना] यह उन ब्राह्मणोंका विनय है, यही उनका स्वाभाविक शम कहा जाता है तथा स्वभावसे ही दान्त (जितेन्द्रिय) होनेके कारण यही उनका दम भी है । इस प्रकार विद्वान् शान्तिको प्राप्त हो जाता है ॥ ८६ ॥
ब्राह्मणोंका जो यह आत्मस्वरूपसे स्थित होनारूप विनय—विनीतत्व है वह स्वाभाविक है । उनका यह विनय और यही प्राकृत—स्वाभाविक अर्थात् अकृतक शम भी कहा जाता है । ब्रह्मस्वभावसे ही उपशान्तरूप है, अतः प्रकृतितः दान्त होनेके कारण यही उनका दम भी है । इस प्रकार उपर्युक्त स्वभावतः शान्त ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष शम—ब्रह्मस्वरूपा स्वाभाविकी उपशान्तिको प्राप्त हो जाता है, अर्थात् ब्रह्मरूपसे स्थित हो जाता है ॥ ८६ ॥
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विप्राणां ब्राह्मणानां विनयो विनीतत्वं स्वाभाविकं यदेतदात्म-स्वरूपेणावस्थानम् । एष विनयः शमोऽप्येष एव प्राकृतः स्वाभाविको-ऽकृतक उच्यते । दमोऽप्येष एव प्रकृतिदान्तत्वात्स्वभावत एव चोपशान्तरूपत्वाद्ब्रह्मणः । एवं यथोक्तं स्वभावोपशान्तं ब्रह्म विद्वाञ्शममुपशान्तिं स्वाभाविकीं ब्रह्मस्वरूपां व्रजेद्ब्रह्मस्वरूपेणावतिष्ठत इत्यर्थः ॥ ८६ ॥
त्रिविध ज्ञेय
इस प्रकार एक-दूसरेसे विरुद्ध होनेके कारण प्रावादुकों (वादियों)-के दर्शन संसारके कारणस्वरूप राग-द्वेषादि दोषोंके आश्रय हैं । अतः वे मिथ्या दर्शन हैं—यह बात उन्हींकी युक्तियोंसे दिखलाकर चारों कोटियोंसे रहित होनेके कारण रागादि दोषोंका अनाश्रयभूत स्वभावतः शान्त अद्वैतदर्शन ही सम्यग्दर्शन है—इस प्रकार उपसंहार किया गया । अब यहाँसे अपनी प्रक्रिया दिखलानेके लिये आरम्भ किया जाता है—
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एवमन्योन्यविरुद्धत्वात्संसार-कारणानि रागद्वेषदोषास्पदानि प्रावादुकानां दर्शनानि । अतो मिथ्यादर्शनानि तानीति तद्युक्तिभिरेव दर्शयित्वा चतुष्कोटिवर्जितत्वा-द्रागादिदोषानास्पदं स्वभावशान्त-मद्वैतदर्शनमेव सम्यग्दर्शन-मित्युपसंहृतम् । अथेदानीं स्वप्रक्रियाप्रदर्शनार्थ आरम्भः—