अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 87

सवस्तु सोपलम्भं च द्वयं लौकिकमिष्यते ।
अवस्तु सोपलम्भं च शुद्धं लौकिकमिष्यते ॥ ८७ ॥

savastu sopalambhaṃ ca dvayaṃ laukikamiṣyate .
avastu sopalambhaṃ ca śuddhaṃ laukikamiṣyate .. 87 ..


वस्तु और उपलब्धि दोनोंके सहित जो द्वैत है उसे लौकिक (जाग्रत्) कहते हैं तथा जो द्वैत वस्तुके बिना केवल उपलब्धिके सहित है, उसे शुद्ध लौकिक (स्वप्न) कहते हैं ॥ ८७ ॥

सवस्तु—व्यावहारिक सत् वस्तुके सहित रहता है, इसलिये जो सवस्तु है तथा उपलम्भ यानी उपलब्धिके सहित है, इसलिये जो ‘सोपलम्भ’ है, ऐसा शास्त्रादि सम्पूर्ण व्यवहारका आश्रयभूत ग्राह्यग्रहणरूप जो द्वैत है वह ‘लौकिक’—लोकसे दूर न रहनेवाला अर्थात् जाग्रत् कहलाता है । वेदान्तोंमें जागरितको ऐसे लक्षणोंवाला माना है ।

संवृतिका भी अभाव होनेके कारण जो ‘अवस्तु’ है—किन्तु ‘सोपलम्भ’ है—वस्तुके न होनेपर भी वस्तुके समान उपलब्ध होना ‘उपलम्भ’ कहलाता है, उसके सहित होनेके कारण जो ‘सोपलम्भ’ है, वह सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये साधारण होनेके कारण शुद्ध—केवल अर्थात् जागरितरूप स्थूल लौकिकसे भिन्न लौकिक माना जाता है; अर्थात् वह स्वप्नावस्था है ॥ ८७ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

सवस्तु संवृतिसता वस्तुना सह वर्तत इति लौकिकम् सवस्तु, तथा चोपलब्धिरुपलम्भस्तेन सह वर्तत इति सोपलम्भं च शास्त्रादिसर्वव्यवहारास्पदं ग्राह्यग्राहकलक्षणं द्वयं लौकिकं लोकादनपेतं लौकिकं जागरितमित्येतत् । एवंलक्षणं जागरितमिष्यते वेदान्तेषु ।

अवस्तु संवृतेरप्यभावात् । सोपलम्भं वस्तु-शुद्धलौकिकम् वदुपलम्भनमुपलम्भो-ऽसत्यपि वस्तुनि तेन सह वर्तत इति सोपलम्भं च । शुद्धं केवलं प्रविभक्तं जागरितात्स्थूलाल्लौकिकं सर्व-प्राणिसाधारणत्वादिष्यते स्वप्न इत्यर्थः ॥ ८७ ॥