ज्ञानं ज्ञेयं च विज्ञेयं सदा बुद्धैः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥
avastvanupalambhaṃ ca lokottaramiti smṛtam .
jñānaṃ jñeyaṃ ca vijñeyaṃ sadā buddhaiḥ prakīrtitam .. 88 ..
अवस्तु और अनुपलम्भ अर्थात् ग्राह्य और ग्रहणसे रहित जो अवस्था है वह ‘लोकोत्तर’ अतएव ‘लोकातीत’ कहलाती है, क्योंकि ग्राह्य और ग्रहणका विषय ही लोक है । उसका अभाव होनेके कारण वह सुषुप्त-अवस्था सम्पूर्ण प्रवृत्तियोंकी बीजभूता है—ऐसा माना गया है ।
उपायके सहित परमार्थतत्त्व तथा लौकिक, शुद्ध लौकिक और लोकोत्तर अवस्थाओंका जिस ज्ञानके द्वारा क्रमशः बोध होता है, उसे ‘ज्ञान’ कहते हैं तथा ये तीनों अवस्थाएँ ही ‘ज्ञेय’ हैं, क्योंकि समस्त वादियोंकी कल्पना की हुई वस्तुओंका इन्हींमें अन्तर्भाव होनेके कारण इनके सिवा किसी अन्य ज्ञेयका होना सम्भव नहीं है । जो परमार्थसत्य तुरीयसंज्ञक अद्वय-अजन्मा आत्मतत्त्व है वही ‘विज्ञेय’ है । ऐसा इसका अभिप्राय है । उन लौकिकसे लेकर विज्ञेयपर्यन्त सम्पूर्ण वस्तुओंका परमार्थदर्शी विद्वानोंने सदा—सर्वदा ही निरूपण किया है ॥ ८८ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अवस्त्वनुपलम्भं च ग्राह्य-लोकोत्तरम् ग्रहणवर्जितमित्येतत्, लोकोत्तरम् अत एव लोकातीतम् । ग्राह्यग्रहण-विषयो हि लोकस्तदभावात्सर्व-प्रवृत्तिबीजं सुषुप्तमित्येतदेवं स्मृतम् ।
सोपायं परमार्थतत्त्वं लौकिकं शुद्धलौकिकं लोकोत्तरं च क्रमेण येन ज्ञानेन ज्ञायते तज्ज्ञानम् । ज्ञेयमेतान्येव त्रीणि । एतद्व्यतिरेकेण ज्ञेयानुपपत्तेः सर्वप्रावादुक-कल्पितवस्तुनोऽत्रैवान्तर्भावात् । विज्ञेयं परमार्थसत्यं तुर्याख्यमद्वय-मजमात्मतत्त्वमित्यर्थः । सदा सर्वदा एतल्लौकिकादिविज्ञेयान्तं बुद्धैः परमार्थदर्शिभिर्ब्रह्मविद्भिः प्रकीर्तितम् ॥ ८८ ॥