अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 89

ज्ञाने च त्रिविधे ज्ञेये क्रमेण विदिते स्वयम् ।
सर्वज्ञता हि सर्वत्र भवतीह महाधियः ॥ ८९ ॥

jñāne ca trividhe jñeye krameṇa vidite svayam .
sarvajñatā hi sarvatra bhavatīha mahādhiyaḥ .. 89 ..


ज्ञान और तीन प्रकारके ज्ञेयको क्रमशः जान लेनेपर इस लोकमें उस महाबुद्धिमान्को स्वयं ही सर्वत्र सर्वज्ञता हो जाती है ॥ ८९ ॥
लौकिकादिविषयक ज्ञान और लौकिकादि तीन प्रकारके ज्ञेयको जान लेनेपर, अर्थात् पहले स्थूल लौकिकको, फिर उसके अभावमें शुद्ध लौकिकको तथा उसके भी अभावमें लोकोत्तरको—इस प्रकार क्रमशः तीनों अवस्थाओंके अभावद्वारा परमार्थसत्य अद्वय, अजन्मा और अभयरूप तुरीयको जान लेनेपर, इस लोकमें उस महाबुद्धिको सर्वत्र यानी सर्वदा स्वयं आत्मस्वरूप ही सर्वज्ञता—जो सर्वरूप ज्ञ (ज्ञानी) हो उसे ‘सर्वज्ञ’ कहते हैं, उसीकी भावरूपा सर्वज्ञता प्राप्त होती है, क्योंकि ऐसा जाननेवालेकी बुद्धि सम्पूर्ण लोकसे बढ़ी हुई वस्तुको विषय करनेवाली होती है । तात्पर्य यह है कि स्वरूपका एक बार ज्ञान हो जानेपर उसका कभी व्यभिचार न होनेके कारण [उसकी सर्वज्ञता सर्वदा रहती है], क्योंकि जिस प्रकार अन्य वादियोंके ज्ञानके उदय और अस्त होते रहते हैं उस प्रकार परमार्थवेत्ता ज्ञानीके ज्ञानके उदय और अस्त नहीं होते ॥ ८९ ॥
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ज्ञाने च लौकिकादिविषये, ज्ञेये च लौकिकादौ त्रिविधे—पूर्वं लौकिकं स्थूलम्, तदभावेन पश्चाच्छुद्धं लौकिकम्, तदभावेन लोकोत्तरमित्येवं क्रमेण स्थान-त्रयाभावेन परमार्थसत्ये तुर्येऽद्वयेऽजेऽभये विदिते स्वयमेवात्मस्वरूपमेव सर्वज्ञता सर्वश्चासौ ज्ञश्च सर्वज्ञस्तद्भावः सर्वज्ञता, इहास्मिँल्लोके भवति महाधियो महाबुद्धेः । सर्वलोकातिशय-वस्तुविषयबुद्धित्वादेवंविदः सर्वत्र सर्वदा भवति । सकृद्विदिते स्वरूपे व्यभिचाराभावादित्यर्थः । न हि परमार्थविदो ज्ञानोद्भवाभिभवौ स्तो यथान्येषां प्रावादुकानाम् ॥ ८९ ॥

[उपर्युक्त श्लोकमें] लौकिकादिको क्रमशः ज्ञेयरूपसे बतलाये जानेके कारण उनके परमार्थतः अस्तित्वकी आशंका न हो जाय—इसलिये कहते हैं—
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लौकिकादीनां क्रमेण ज्ञेयत्वेन निर्देशादस्तित्वाशङ्का परमार्थतो मा भूदित्याह—