तेषामन्यत्र विज्ञेयादुपलम्भस्त्रिषु स्मृतः ॥ ९० ॥
heyajñeyāpyapākyāni vijñeyānyagrayāṇataḥ .
teṣāmanyatra vijñeyādupalambhastriṣu smṛtaḥ .. 90 ..
लौकिकादि तीन हेय हैं । तात्पर्य यह है कि जागरित, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ रज्जुमें सर्पके समान आत्मामें असत् होनेके कारण त्यागने योग्य हैं । चारों कोटियोंसे रहित परमार्थतत्त्व ही यहाँ ज्ञेय माना गया है । बाह्य तीनों एषणाओंको त्याग देनेवाले मुमुक्षुके लिये पाण्डित्य, बाल्य और मौन नामक तीन साधन ही आप्य—प्राप्तव्य हैं; तथा राग, द्वेष और मोह आदि कषायसंज्ञक दोष ही [उसके लिये] पाक्य—पाक (जीर्ण) करने योग्य हैं । तात्पर्य यह है कि मुमुक्षुको हेय, ज्ञेय, आप्य और पाक्य इन सबको ही अग्रयाणतः—सबसे पहले अपने साधनरूपसे जानना चाहिये ।
उन हेय आदिमेंसे केवल एक परमार्थसत्य ज्ञेय ब्रह्मको छोड़कर शेष हेय, आप्य और पाक्य—इन तीनोंमें ब्रह्मवेत्ताओंने केवल उपलम्भ—
उपलम्भन यानी अविद्यामय कल्पनामात्र ही माना है, अर्थात् इन तीनोंकी परमार्थ सत्यता स्वीकार नहीं की है ॥ ९० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
हेयानि च लौकिकादीनि त्रीणि जागरितस्वप्नसुषुप्तान्यात्मन्यसत्त्वेन रज्ज्वां सर्पवद्धातव्यानीत्यर्थः । ज्ञेयमिह चतुष्कोटिवर्जितं परमार्थतत्त्वम् । आप्यान्याप्तव्यानि त्यक्तबाह्यैषणात्रयेण भिक्षुणा पाण्डित्यबाल्यमौनाख्यानि साधनानि । पाक्यानि रागद्वेषमोहादयो दोषाः कषायाख्यानि पक्तव्यानि । सर्वाण्येतानि हेयज्ञेयाप्यपाक्यानि विज्ञेयानि भिक्षुणोपायत्वेनेत्यर्थः, अग्रयाणतः प्रथमतः ।
तेषां हेयादीनामन्यत्र विज्ञेयात्परमार्थसत्यं विज्ञेयं ब्रह्मैकं वर्जयित्वा, उपलम्भनमुपलम्भो- ऽविद्याकल्पनामात्रम् । हेयाप्यपाक्येषु त्रिष्वपि स्मृतो ब्रह्मविद्भिर्न परमार्थ-सत्यता त्रयाणामित्यर्थः ॥ ९० ॥