अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 9

सांसिद्धिकी स्वाभाविकी सहजा अकृता च या ।
प्रकृतिः सेति विज्ञेया स्वभावं न जहाति या ॥ ९ ॥

sāṃsiddhikī svābhāvikī sahajā akṛtā ca yā .
prakṛtiḥ seti vijñeyā svabhāvaṃ na jahāti yā .. 9 ..


जो उत्तम सिद्धि द्वारा प्राप्त, स्वभावसिद्धा, सहजा और अकृता है तथा कभी अपने स्वभाव का परित्याग नहीं करती वही ‘प्रकृति’ है—ऐसा जानना चाहिये ॥ ९ ॥

सम्यक् सिद्धि का नाम संसिद्धि है; उससे होनेवाली को ‘सांसिद्धिकी’ कहते हैं; जिस प्रकार कि सिद्ध योगियों को अणिमादि ऐश्वर्य की प्राप्ति उनकी प्रकृति है । योगियों की उस प्रकृति का भूत और भविष्यत् काल में भी विपर्यय नहीं होता—वह जैसी-की-तैसी ही रहती है ।

तथा ‘स्वाभाविकी’ वस्तु के स्वभाव से सिद्ध; जैसी कि अग्नि आदि की उष्णता एवं प्रकाशादिरूपा प्रकृति होती है । उसका भी कालान्तर और देशान्तर में व्यभिचार नहीं होता । तथा ‘सहजा’—अपने साथ ही उत्पन्न होनेवाली; जैसे कि पक्षी आदि की आकाशगमनादिरूपा प्रकृति होती है ।

और भी जो कोई ‘अकृता’— किसी के द्वारा सम्पादन न की हुई; जैसे कि जलों की प्रकृति निम्न प्रदेश की ओर जाने की है । तथा इसके सिवा अन्य भी जो कोई अपने स्वभाव को नहीं छोड़ती उस सबको लोक में ‘प्रकृति’ नाम से ही जानना चाहिये । मिथ्या कल्पना की हुई लौकिक वस्तुओं में भी उनकी प्रकृति अन्यथा नहीं होती; फिर अजस्वभाव परमार्थ वस्तुओं में उनकी अमृतत्वलक्षणा प्रकृति अन्यथा नहीं हो सकती—इसमें तो कहना ही क्या है? यह इसका अभिप्राय है ॥ ९ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

सम्यक्सिद्धिः संसिद्धिस्तत्र भवा सांसिद्धिकी यथा योगिनां सिद्धानाम् अणिमाद्यैश्वर्यप्राप्तिः प्रकृतिः । सा भूतभविष्यत्कालयोरपि योगिनां न विपर्येति तथैव सा तथा स्वाभाविकी द्रव्यस्वभावत एव यथाग्न्यादीनाम् उष्णप्रकाशादिलक्षणा, सापि न कालान्तरे व्यभिचरति देशान्तरे च । तथा सहजा आत्मना सहैव जाता यथा पक्ष्यादीनामाकाशगमनादिलक्षणा ।

अन्यापि या काचिदकृता केनचिन्न कृता यथापां निम्नदेशगमनादिलक्षणा । अन्यापि या काचित्स्वभावं न जहाति सा सर्वा प्रकृतिरिति विज्ञेया लोके । मिथ्याकल्पितेषु लौकिकेष्वपि वस्तुषु प्रकृतिर्नान्यथा भवति किमुताजस्वभावेषु परमार्थवस्तुष्वमृतत्वलक्षणा प्रकृतिर्नान्यथा भवतीत्यभिप्रायः ॥ ९ ॥


जीव का जरामरण मानने में दोष

वादीलोग जिसके अन्यथाभाव की कल्पना करते हैं उस प्रकृति का विषय क्या है? और उनकी कल्पना में क्या दोष है? इसपर कहते हैं—
संस्कृत भाष्य पढ़ें
किं विषया पुनः सा प्रकृतिर्यस्या अन्यथाभावो वादिभिः कल्प्यते कल्पनायां वा को दोष इत्याह—