प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः सर्वे धर्मा अनादयः ।
विद्यते न हि नानात्वं तेषां क्वचन किञ्चन ॥ ९१ ॥
विद्यते न हि नानात्वं तेषां क्वचन किञ्चन ॥ ९१ ॥
prakṛtyākāśavajjñeyāḥ sarve dharmā anādayaḥ .
vidyate na hi nānātvaṃ teṣāṃ kvacana kiñcana .. 91 ..
सम्पूर्ण जीवोंको स्वभावसे ही आकाशके समान और अनादि जानना चाहिये । उनका नानात्व कहीं कुछ भी नहीं है ॥ ९१ ॥
मुमुक्षुओंको सूक्ष्मत्व, निरञ्जनत्व और सर्वगतत्व आदिके कारण सभी धर्मों—जीवोंको प्रकृतिसे अर्थात् स्वभावतः आकाशवत्—आकाशके समान और अनादि यानी नित्य जानना चाहिये । यहाँ बहुवचनके कारण होनेवाले जीवात्माओंके भेदकी आशंकाका निराकरण करते हुए कहते हैं—‘उनका क्वचन—कहीं, किञ्चन—कुछ भी अर्थात् अणुमात्र भी नानात्व नहीं है’ ॥ ९१ ॥
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प्रकृत्या स्वभावत आकाश-वदाकाशतुल्याः सूक्ष्मनिरञ्जन-सर्वगतत्वैः सर्वे धर्मा आत्मानो ज्ञेया मुमुक्षुभिरनादयो नित्याः । बहुवचनकृतभेदाशङ्कां निराकुर्वन्नाह—क्वचन किञ्चन किञ्चिदणुमात्रमपि तेषां न विद्यते नानात्वमिति ॥ ९१ ॥
आत्मतत्त्वनिरूपण
आत्माओंकी जो ज्ञेयता है वह भी व्यावहारिक ही है, परमार्थतः नहीं—इसी अभिप्रायसे कहते हैं—
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ज्ञेयतापि धर्माणां संवृत्यैव न परमार्थत इत्याह—