अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 93

आदिशान्ता ह्यनुत्पन्नाः प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः ।
सर्वे धर्माः समाभिन्ना अजं साम्यं विशारदम् ॥ ९३ ॥

ādiśāntā hyanutpannāḥ prakṛtyaiva sunirvṛtāḥ .
sarve dharmāḥ samābhinnā ajaṃ sāmyaṃ viśāradam .. 93 ..


सम्पूर्ण आत्मा नित्यशान्त, अजन्मा, स्वभाव से ही अत्यन्त उपरत तथा सम और अभिन्न हैं । [इस प्रकार क्योंकि] आत्मतत्त्व अज, समतारूप और विशुद्ध है [इसलिये उसकी शान्ति अथवा मोक्ष कर्तव्य नहीं है] ॥ ९३ ॥
क्योंकि सम्पूर्ण धर्म आदिशान्त—सर्वदा ही शान्तस्वरूप, अनुत्पन्न—अजन्मा, स्वभाव से ही सुनिर्वृत अर्थात् अत्यन्त उपरत स्वभाववाले हैं; तथा सम और अभिन्न हैं; इस प्रकार, क्योंकि आत्मतत्त्व अजन्मा, समतारूप और विशुद्ध है, इसलिये उसकी शान्ति अथवा मोक्ष कर्तव्य नहीं है—यह इसका अभिप्राय है, क्योंकि उस नित्य एकस्वभाव के लिये कुछ भी करना सार्थक नहीं हो सकता ॥ ९३ ॥
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यस्मादादिशान्ता नित्यमेव शान्ता अनुत्पन्ना अजाश्च प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः सुष्ठूपरतस्वभावा इत्यर्थः, सर्वे धर्माः समाश्चाभिन्नाश्च समाभिन्नाः, अजं साम्यं विशारदं विशुद्धमात्मतत्त्वं यस्मात्तस्माच्छान्तिर्मोक्षो वा नास्ति कर्तव्य इत्यर्थः, न हि नित्यैकस्वभावस्य कृतं किञ्चिदर्थवत्स्यात् ॥ ९३ ॥

आत्मज्ञ ही अकृपण है

जो लोग उपर्युक्त परमार्थतत्त्व को समझते हैं लोक में वे ही अकृपण हैं, उनके सिवा और सब तो कृपण ही हैं—इसी भाव को लेकर कहते हैं—
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ये यथोक्तं परमार्थतत्त्वं प्रतिपन्नास्ते एवाकृपणा लोके कृपणा एवान्य इत्याह—