वैशारद्यं तु वै नास्ति भेदे विचरतां सदा ।
भेदनिम्नाः पृथग्वादास्तस्मात्ते कृपणाः स्मृताः ॥ ९४ ॥
भेदनिम्नाः पृथग्वादास्तस्मात्ते कृपणाः स्मृताः ॥ ९४ ॥
vaiśāradyaṃ tu vai nāsti bhede vicaratāṃ sadā .
bhedanimnāḥ pṛthagvādāstasmātte kṛpaṇāḥ smṛtāḥ .. 94 ..
जो लोग सर्वदा भेद में ही विचरते रहते हैं, निश्चय ही उनकी विशुद्धि नहीं होती । द्वैतवादी लोग भेद की ही ओर प्रवृत्त होनेवाले हैं; इसलिये वे कृपण (दीन) माने गये हैं ॥ ९४ ॥
क्योंकि वे भेदनिम्न—भेदानुयायी अर्थात् संसार के अनुगामी हैं, कौन लोग? पृथग्वादी—‘पृथक् अर्थात् नाना वस्तु है’—ऐसा जिनका कथन है वे पृथग्वादी अर्थात् द्वैतीलोग, इसलिये वे कृपण—क्षुद्र माने गये हैं; क्योंकि भेद अर्थात् अविद्यापरिकल्पित द्वैतमार्ग में सर्वदा विचरनेवाले उन लोगों का वैशारद्य अर्थात् विशुद्धि नहीं होती । अतः उनका कृपण होना ठीक ही है—ऐसा इसका अभिप्राय है ॥ ९४ ॥
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यस्माद्भेदनिम्ना भेदानुयायिनः संसारानुगा इत्यर्थः; के? पृथग्वादाः पृथङ्नाना वस्त्वित्येवं वदनं येषां ते पृथग्वादा द्वैतिन इत्यर्थः, तस्मात्ते कृपणाः क्षुद्राः स्मृताः; यस्माद्वैशारद्यं विशुद्धिर्नास्ति तेषां भेदे विचरतां द्वैतमार्गेऽविद्याकल्पिते सर्वदा वर्तमानानामित्यर्थः । अतो युक्तमेव तेषां कार्पण्यमित्यभिप्रायः ॥ ९४ ॥
आत्मज्ञ का महाज्ञानित्व
यह जो परमार्थतत्त्व है वह क्षुद्रचित्त अविवेकी तथा वेदान्त के अनधिकारी क्षुद्र और मन्दबुद्धि पुरुषों की समझ में नहीं आ सकता—इस आशय से कहते हैं—
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यदिदं परमार्थतत्त्वममहात्मभिरपण्डितैर्वेदान्तबहिःष्ठैः क्षुद्रैरल्पप्रज्ञैरनवगाह्यमित्याह—