ते हि लोके महाज्ञानास्तच्च लोको न गाहते ॥ ९५ ॥
aje sāmye tu ye kecidbhaviṣyanti suniścitāḥ .
te hi loke mahājñānāstacca loko na gāhate .. 95 ..
उस अज और साम्यरूप परमार्थतत्त्व में जो कोई—स्त्री आदि भी ‘यह ऐसा ही है’ इस प्रकार पूर्णतया निश्चित होंगे वे ही लोक में महाज्ञानी अर्थात् निरतिशय तत्त्वविषयक ज्ञानवाले हैं ।
उस—उनके मार्ग अर्थात् उन्हें विदित हुए परमार्थतत्त्व में अन्य साधारण बुद्धिवाला मनुष्य अवगाहन-अवतरण नहीं करता अर्थात् उसे विषय नहीं कर सकता । “जो सम्पूर्ण भूतों का आत्मभूत और सब प्राणियों का हितकारी है उस पदरहित (प्राप्य पुरुषार्थहीन) महात्मा के पद को जानने की इच्छावाले देवता भी उसके मार्ग में मोह को प्राप्त हो जाते हैं तथा आकाश में जैसे पक्षियों का मार्ग नहीं मिलता उसी प्रकार उसकी गति का पता नहीं चलता” इत्यादि स्मृति से भी यही प्रमाणित होता है ॥ ९५ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अजे साम्ये परमार्थतत्त्व एवमेवेति ये केचित्स्त्र्यादयोऽपि सुनिश्चिता भविष्यन्ति चेत्त एव हि लोके महाज्ञाना निरतिशय तत्त्वविषयज्ञाना इत्यर्थः ।
तच्च तेषां वर्त्म तेषां विदितं परमार्थतत्त्वं सामान्यबुद्धिरन्यो लोको न गाहते नावतरति न विषयीकरोतीत्यर्थः । “सर्वभूतात्मभूतस्य सर्वभूतहितस्य च । देवा अपि मार्गे मुह्यन्त्यपदस्य पदैषिणः । शकुनीनामिवाकाशे गतिर्नैवोपलभ्यते” (महा० शा० २३९ । २३-२४) इत्यादिस्मरणात् ॥ ९५ ॥