अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 96

अजेष्वजमसंक्रान्तं धर्मेषु ज्ञानमिष्यते ।
यतो न क्रमते ज्ञानमसङ्गं तेन कीर्तितम् ॥ ९६ ॥

ajeṣvajamasaṃkrāntaṃ dharmeṣu jñānamiṣyate .
yato na kramate jñānamasaṅgaṃ tena kīrtitam .. 96 ..


अजन्मा आत्माओं में स्थित अज (नित्य) ज्ञान असंक्रान्त (अन्य विषयों से न मिलनेवाला) माना जाता है । क्योंकि वह ज्ञान अन्य विषयों में संक्रमित नहीं होता इसलिये उसे असंग बतलाया गया है ॥ ९६ ॥
क्योंकि अज—अनुत्पन्न यानी अचल धर्मों—आत्माओं में सूर्य में उष्णता और प्रकाश के समान अज अर्थात् अचल ज्ञान माना जाता है, अतः अर्थान्तर में असंक्रान्त (अनुप्रविष्ट) ज्ञान को अजन्मा (नित्य) स्वीकार किया जाता है । क्योंकि वह ज्ञान दूसरे विषयों में संक्रमित नहीं होता, इसलिये उसे असंग कहा गया है; अर्थात् वह आकाश के समान है—ऐसा कहा है ॥ ९६ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
अजेष्वनुत्पन्नेष्वचलेषु धर्मेष्वात्मस्वजमचलं च ज्ञानमिष्यते सवितरीवौष्ण्यं प्रकाशश्च यतस्तस्मादसंक्रान्तमर्थान्तरे ज्ञानमजमिष्यते । यस्मान्न क्रमतेऽर्थान्तरे ज्ञानं तेन कारणेनासङ्गं तत्कीर्तितमाकाशकल्पमित्युक्तम् ॥ ९६ ॥