अणुमात्रेऽपि वैधर्म्ये जायमानेऽविपश्चितः ।
असङ्गता सदा नास्ति किमुतावरणच्युतिः ॥ ९७ ॥
असङ्गता सदा नास्ति किमुतावरणच्युतिः ॥ ९७ ॥
aṇumātre’pi vaidharmye jāyamāne’vipaścitaḥ .
asaṅgatā sadā nāsti kimutāvaraṇacyutiḥ .. 97 ..
[अन्य वादियों के मतानुसार] किसी अणुमात्र भी विधर्मी वस्तु की उत्पत्ति मानने पर तो अविवेकी पुरुष की असंगता भी कभी नहीं हो सकती; फिर उसके आवरणनाश के विषय में तो कहना ही क्या है? ॥ ९७ ॥
इससे भिन्न जो अन्य वादी हैं उनके मतानुसार अणुमात्र अर्थात् थोड़ी-सी भी विधर्मी वस्तु के बाहर या भीतर उत्पन्न होने पर तो अविपश्चित्—अविवेकी पुरुष की कभी असङ्गता भी नहीं हो सकती, फिर उसकी आवरणच्युति अर्थात् बन्धनाश नहीं होता—इसके सम्बन्ध में तो कहना ही क्या है? ॥ ९७ ॥
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इतोऽन्येषां वादिनामणुमात्रेऽपि वैधर्म्ये वस्तुनि बहिरन्तर्वा जायमान उत्पाद्यमानेऽविपश्चितोऽविवेकिनोऽसङ्गता असङ्गत्वं सदा नास्ति किमुत वक्तव्यमावरणच्युतिर्बन्धनाशो नास्तीति ॥ ९७ ॥
आत्माका स्वाभाविक स्वरूप
उनकी आवरणच्युति नहीं होती—ऐसा कहकर तो तुमने अपने सिद्धान्त में भी आत्माओं का आवरण स्वीकार कर लिया [—ऐसा यदि कोई कहे तो] इस पर हमारा कहना है—नहीं ।
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तेषामावरणच्युतिर्नास्तीति ब्रुवतां स्वसिद्धान्तेऽभ्युपगतं तर्हि धर्माणामावरणम् । नेत्युच्यते ।