अलातशान्ति प्रकरण - कारिका 98

अलब्धावरणाः सर्वे धर्माः प्रकृतिनिर्मलाः ।
आदौ बुद्धास्तथा मुक्ता बुध्यन्त इति नायकाः ॥ ९८ ॥

alabdhāvaraṇāḥ sarve dharmāḥ prakṛtinirmalāḥ .
ādau buddhāstathā muktā budhyanta iti nāyakāḥ .. 98 ..


समस्त आत्मा आवरणशून्य, स्वभाव से ही निर्मल तथा नित्य बुद्ध और मुक्त हैं । तथापि स्वामीलोग (वेदान्ताचार्यगण) ‘वे जाने जाते हैं’ ऐसा [उनके विषय में कहते हैं] ॥ ९८ ॥

‘अलब्धावरणाः’—जिन्हें आवरण अर्थात् अविद्यादिरूप बन्धनलाभ अर्थात् प्राप्त नहीं हुआ है वे धर्म अलब्धावरण अर्थात् बन्धनरहित, प्रकृति-निर्मल-स्वभाव से ही शुद्ध और आरम्भ में ही बोध को प्राप्त हुए तथा मुक्तस्वरूप हैं, क्योंकि वे नित्य शुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव हैं ।

शंका—यदि ऐसी बात है तो उनके विषय में ‘वे जाने जाते हैं’ ऐसा क्यों कहा जाता है?

समाधान—नायक—स्वामी लोग—जानने में समर्थ अर्थात् बोधशक्तियुक्त स्वभाववाले लोग उनके विषय में उसी प्रकार ऐसा कहते हैं जैसे कि नित्य प्रकाशस्वरूप होने पर भी सूर्य के विषय में ‘सूर्य प्रकाशमान है’ ऐसा कहा जाता है तथा सर्वदा गतिशून्य होने पर भी ‘पर्वत खड़े हैं’ ऐसा कहा जाता है ॥ ९८ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

अलब्धावरणाः—अलब्धमप्राप्तमावरणमविद्यादिबन्धनं येषां ते धर्मा अलब्धावरणा बन्धनरहिता इत्यर्थः, प्रकृतिनिर्मलाः स्वभावशुद्धा आदौ बुद्धास्तथा मुक्ता यस्मान्नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावाः ।

यद्येवं कथं तर्हि बुध्यन्त इत्युच्यते?

नायकाः स्वामिनः समर्था बोद्धुं बोधशक्तिमत्स्वभावा इत्यर्थः, यथा नित्यप्रकाशस्वरूपोऽपि सविता प्रकाशत इत्युच्यते यथा वा नित्यनिवृत्तगतयोऽपि नित्यमेव शैलास्तिष्ठन्तीत्युच्यते तद्वत् ॥ ९८ ॥