सर्वे धर्मास्तथा ज्ञानं नैतद्बुद्धेन भाषितम् ॥ ९९ ॥
kramate na hi buddhasya jñānaṃ dharmeṣu tāyinaḥ .
sarve dharmāstathā jñānaṃ naitadbuddhena bhāṣitam .. 99 ..
तायी—जिसका ताय यानी (विस्तार) हो उसे तायी कहते हैं । क्योंकि तायी—सन्तानवान्—निरन्तर अर्थात् आकाशसदृश पूजावान् अथवा प्रज्ञावान् बुद्ध—परमार्थदर्शी का ज्ञान धर्मों में—विषयान्तरों में संक्रमित नहीं होता, अपितु सूर्य में प्रकाश की भाँति आत्मनिष्ठ रहता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण धर्म अर्थात् आत्मा भी ज्ञान के समान ही आकाशसदृश होने के कारण कभी अर्थान्तर में संक्रमित नहीं होते अर्थात् नहीं जाते ।
इस प्रकरण के आरम्भ में जिसका ‘ज्ञानेनाकाशकल्पेन’ इत्यादि श्लोकद्वारा उपन्यास किया गया है, आकाशसदृश निरन्तर बोधवान् का—उससे अभिन्न होने के कारण—वही यह आकाशसदृश ज्ञान कभी अर्थान्तर में संक्रमित नहीं होता; और ऐसे ही धर्म भी हैं अर्थात् वे भी आकाश के समान अचल, अविक्रिय, निरवयव, नित्य, अद्वितीय, असंग, अदृश्य, अग्राह्य और क्षुधा-पिपासादि से रहित ब्रह्मात्मतत्त्व ही हैं; जैसा कि “द्रष्टा की दृष्टि का लोप नहीं होता” इस श्रुति से सिद्ध होता है ।
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता के भेद से रहित इस अद्वय परमार्थतत्त्व का बुद्ध ने निरूपण नहीं किया; यद्यपि उसने बाह्यवस्तु का निराकरण और केवल ज्ञान की ही कल्पना—ये अद्वय वस्तु के समीपवर्ती ही विषय कहे हैं; तात्पर्य यह है कि इस अद्वैत परमार्थतत्त्व को तो वेदान्त का ही विषय जानना चाहिये ॥ ९९ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
यस्मान्न हि क्रमते बुद्धस्य परमार्थदर्शिनो ज्ञानं विषयान्तरेषु धर्मेषु धर्मसंस्थं सवितरीव प्रभा, तायिनः तायोऽस्यास्तीति तायी, संतानवतो निरन्तरस्याकाशकल्पस्येत्यर्थः, पूजावतो वा प्रज्ञावतो वा, सर्वे धर्मा आत्मानोऽपि तथा ज्ञानवदेवाकाशकल्पत्वान्न क्रमन्ते क्वचिदप्यर्थान्तर इत्यर्थः ।
यदादावुपन्यस्तं ज्ञानेनाकाशकल्पेनेत्यादि तदिदमाकाशकल्पस्य तायिनो बुद्धस्य तदनन्यत्वादाकाशकल्पं ज्ञानं न क्रमते क्वचिदप्यर्थान्तरे । तथा धर्मा इति । आकाशमिवाचलमविक्रियं निरवयवं नित्यमद्वितीयमसङ्गमदृश्यमग्राह्यमशनायाद्यतीतं ब्रह्मात्मतत्त्वम् । “न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते” (बृ० उ० ४ । ३ । २३) इति श्रुतेः ।
ज्ञानज्ञेयज्ञातृभेदरहितं परमार्थतत्त्वमद्वयम् एतन्न बुद्धेन भाषितम् । यद्यपि बाह्यार्थनिराकरणं ज्ञानमात्रकल्पना चाद्वयवस्तुसामीप्यमुक्तम् । इदं तु परमार्थतत्त्वमद्वैतं वेदान्तेष्वेव विज्ञेयमित्यर्थः ॥ ९९ ॥