दुर्दर्शमतिगम्भीरमजं साम्यं विशारदम् ।
बुद्ध्वा पदमनानात्वं नमस्कुर्मो यथाबलम् ॥ १०० ॥
बुद्ध्वा पदमनानात्वं नमस्कुर्मो यथाबलम् ॥ १०० ॥
durdarśamatigambhīramajaṃ sāmyaṃ viśāradam .
buddhvā padamanānātvaṃ namaskurmo yathābalam .. 100 ..
दुर्दर्श, अत्यन्त गम्भीर, अज, निर्विशेष और विशुद्ध पद को भेदरहित जानकर हम उसे यथाशक्ति नमस्कार करते हैं ॥ १०० ॥
जिसका कठिनता से दर्शन हो सकता है ऐसे दुर्दर्श अर्थात् अस्ति-नास्ति आदि चारों कोटियों से रहित होने के कारण दुर्विज्ञेय, अतएव अति गम्भीर—मन्दबुद्धियों के लिये महासमुद्र के समान दुष्प्रवेश्य तथा अजन्मा, साम्यरूप (निर्विशेष) और विशुद्ध—ऐसे पद को भेदरहित जानकर तद्रूप हो और उस अव्यवहार्यपद को भी व्यवहार का विषय बनाकर हम उसको यथाबल—यथाशक्ति नमस्कार करते हैं ॥ १०० ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
दुर्दर्शं दुःखेन दर्शनमस्येति दुर्दर्शम्, अस्ति नास्तीति चतुष्कोटिवर्जितत्वाद्दुर्विज्ञेयमित्यर्थः । अत एवातिगम्भीरं दुष्प्रवेशं महासमुद्रवदकृतप्रज्ञैः, अजं साम्यं विशारदम्, ईदृक्पदमनानात्वं नानात्ववर्जितं बुद्ध्वावगम्य तद्भूताः सन्तो नमस्कुर्मस्तस्मै पदाय, अव्यवहार्यमपि व्यवहारगोचरमापाद्य यथाबलं यथाशक्तीत्यर्थः ॥ १०० ॥