स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥
oṃ brahmā devānāṃ prathamaḥ sambabhūva viśvasya kartā bhuvanasya goptā .
sa brahmavidyāṃ sarvavidyāpratiṣṭhāmatharvāya jyeṣṭhaputrāya prāha .. 1 ..
ब्रह्मा—परिवृढ (सबसे बढ़ा हुआ) अर्थात् महान्, जो धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य में अन्य सबसे बढ़ा हुआ था, देवताओं—द्योतन करनेवालों (प्रकाशमानों), इन्द्रादिकों में प्रथम—गुणोंद्वारा प्रधानरूप से अथवा सम्यक् स्वतन्त्रतापूर्वक सबसे पहले उत्पन्न हुआ था यह इसका तात्पर्य है क्योंकि “जो यह अतीन्द्रिय, अग्राह्य…….है [वह परमात्मा स्वयं उत्पन्न हुआ]” इत्यादि स्मृति के अनुसार वह, जैसे अन्य संसारी जीव उत्पन्न होते हैं उस तरह धर्म या अधर्म के वशीभूत होकर उत्पन्न नहीं हुआ ।
‘विश्व अर्थात् सम्पूर्ण जगत् का’ कर्ता—उत्पन्न करनेवाला तथा उत्पन्न हुए भुवन का गोप्ता—पालन करनेवाला’ ये ब्रह्मा के विशेषण [उसकी उपदेश की हुई] विद्या की स्तुति के लिये हैं । जिसका महत्त्व इस प्रकार प्रसिद्ध है उस ब्रह्मा ने ब्रह्मविद्या को—ब्रह्म यानी परमात्मा की विद्या को, ‘जिससे अक्षर और जो सत्य पुरुष को जानता है’ ऐसे विशेषण से युक्त होने के कारण परमात्मसम्बन्धिनी ही है अथवा अग्रजन्मा ब्रह्मा के द्वारा कही जाने के कारण जो ब्रह्मविद्या कहलाती है उस ब्रह्मविद्या को, जो समस्त विद्याओं की अभिव्यक्ति की हेतुभूत होने से अथवा “जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है तथा अज्ञात ज्ञात हो जाता है” इस श्रुति के अनुसार इसी से सर्वविद्यावेद्य वस्तु का ज्ञान होता है, इसलिये जो सर्वविद्याप्रतिष्ठा यानी सम्पूर्ण विद्याओं की आश्रयभूता है, अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा से कहा । यहाँ ‘सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्’ इस पद से विद्या की स्तुति करते हैं । जो ज्येष्ठ (सबसे बड़ा) पुत्र हो उसे ज्येष्ठ पुत्र कहते हैं । ब्रह्मा की सृष्टि के अनेकों प्रकारों में किसी एक सृष्टिप्रकार के आदि में सबसे पहले अथर्वा को ही उत्पन्न किया गया था, इसलिये वह ज्येष्ठ है । उस ज्येष्ठ पुत्र से कहा ॥ १ ॥
तात्पर्य पढ़ें
ब्रह्मा परिवृढो महान्धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यैः सर्वानन्यानतिशेत इति । देवानां द्योतनवतामिन्द्रादीनां प्रथमो गुणैः प्रधानः सन् प्रथमोऽग्रे वा सम्बभूवाभिव्यक्तः सम्यक्स्वातन्त्र्येणेत्यभिप्रायः । न तथा यथा धर्माधर्मवशात् संसारिणोऽन्ये जायन्ते । “योऽसावतीन्द्रियोऽग्राह्यः…..” (मनु० १ ।७) इत्यादिस्मृतेः ।
विश्वस्य सर्वस्य जगतः कर्तोत्पादयिता । भुवनस्योत्पन्नस्य गोप्ता पालयितेति विशेषणं ब्रह्मणो विद्यास्तुतये । स एवं प्रख्यातमहत्त्वो ब्रह्मा ब्रह्मविद्यां ब्रह्मणः परमात्मनो विद्यां ब्रह्मविद्यां ‘येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यम्’ (मु०उ० १ ।२ ।१३) इति विशेषणात्परमात्मविषया हि सा ब्रह्मणा वाग्रजेनोक्तेति ब्रह्मविद्या तां सर्वविद्याप्रतिष्ठां सर्वविद्याभिव्यक्तिहेतुत्वात्सर्वविद्याश्रयामित्यर्थः; सर्वविद्यावेद्यं वा वस्त्वनयैव विज्ञायत इति, “येनाश्रुतं श्रुतं भवति अमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्” (छा०उ० ६ ।१ ।३) इति श्रुतेः । सर्वविद्याप्रतिष्ठामिति च स्तौति । विद्यामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह । ज्येष्ठश्चासौ पुत्राश्चानेकेषु ब्रह्मणः सृष्टिप्रकारेष्वन्यतमस्य सृष्टिप्रकारस्य प्रमुखे पूर्वमथर्वा सृष्ट इति ज्येष्ठस्तस्मै ज्येष्ठपुत्राय प्राहोक्तवान् ॥ १ ॥