मुण्डक 1 खण्ड 1 - मन्त्र 3

शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ ।
कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ ३ ॥

śaunako ha vai mahāśālo’ṅgirasaṃ vidhivadupasannaḥ papraccha .
kasminnu bhagavo vijñāte sarvamidaṃ vijñātaṃ bhavatīti .. 3 ..


शौनक नामक प्रसिद्ध महागृहस्थ ने अंगिरा के पास विधिपूर्वक जाकर पूछा—‘भगवन्! किसके जान लिये जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है? ’ ॥ ३ ॥

महाशाल—महागृहस्थ शौनक—शुनक के पुत्र ने भारद्वाज के शिष्य आचार्य अंगिरा के पास विधिवत् अर्थात् शास्त्रानुसार जाकर पूछा । शौनक और अंगिरा के सम्बन्ध से पश्चात् ‘विधिवत्’ विशेषण मिलने से यह जाना जाता है कि इनसे पूर्व आचार्यों में [गुरूपसदन] कोई नियम नहीं था । अतः इसकी मर्यादा निर्दिष्ट करने के लिये अथवा मध्यदीपिकान्याय के लिये[ * ] यह विशेषण दिया गया है, क्योंकि यह उपसदनविधि हमलोगों में भी माननीय है ।

[ * ]: देहली पर दीपक रखने से उसका प्रकाश भीतर-बाहर दोनों ओर पड़ता है—इसी को मध्यदीपिका या देहलीदीपन्याय कहते हैं । अतः यदि यह कथन इस न्याय से ही हो तो यह समझना चाहिये कि गुरूपसदन-विधि इससे पूर्व भी थी और उससे पीछे हमलोगों के लिये भी आवश्यक है; और यदि यह कथन मर्यादा निर्दिष्ट करने के लिये हो तो यह समझना चाहिये कि यहीं से इस पद्धति का प्रारम्भ हुआ ।

शौनक ने क्या पूछा, सो बतलाते हैं—भगवः—हे भगवन्! ‘कस्मिन्नु’ किस वस्तु के जान लिये जानेपर यह सब विज्ञेय पदार्थ विज्ञात—विशेषरूप से ज्ञात यानी अवगत हो जाता है? यहाँ ‘नु’ का प्रयोग वितर्क (संशय)-के लिये किया गया है । शौनक ने ‘एक ही को जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है’ ऐसी कोई सभ्य पुरुषों की कहावत सुनी थी । उसे विशेषरूप से जानने की इच्छा से ही उसने ‘कस्मिन्नु’ इत्यादि रूप से वितर्क करते हुए पूछा । अथवा लोगों की सामान्य दृष्टि से जान-बूझकर ही पूछा । लोक में सुवर्णादि खण्डों के ऐसे भेद हैं जो सुवर्णरूप होने के कारण लौकिक पुरुषोंद्वारा [स्वर्णदृष्टि से] उनकी एकता का ज्ञान होनेपर जान लिये जाते हैं । इसी प्रकार [प्रश्न होता है कि] ‘सम्पूर्ण जगद्भेद का वह एक कारण कौन-सा है जिस एक के ही जान लिये जानेपर यह सब कुछ जान लिया जाता है? ’

शंका—जिस वस्तु का ज्ञान नहीं होता उसके विषय में ‘कस्मिन्’ (किसको)[ * ] इस प्रकार प्रश्न करना तो बन नहीं सकता । उस समय तो ‘क्या वह है? ’ ऐसा प्रश्न ही उचित है; फिर उसका अस्तित्व सिद्ध हो जानेपर ही ‘कस्मिन्’ ऐसा प्रश्न हो सकता है । जैसा कि [अनेक आधारों का ज्ञान होनेपर] ‘किसमें रखा जाय’ ऐसा प्रश्न किया जाता है ।

[ * ]: क्योंकि ‘किस’ या ‘कौन’ सर्वनाम का प्रयोग वहीं होता है जहाँ अनेकों की सत्ता स्वीकारकर उनमें से किसी एक का निश्चय करना होता है ।

समाधान—ऐसा मत कहो, क्योंकि [तुम्हारे कथनानुसार प्रश्न करने से] अक्षरों की अधिकता होती है और अधिक आयास का भय रहता है, अतः ‘किस एक के ही जान लेनेपर मनुष्य सर्वज्ञ हो जाता है? ’ ऐसा प्रश्न बन सकता है ॥ ३ ॥

तात्पर्य पढ़ें

शौनकः शुनकस्यापत्यं महाशालो महागृहस्थोऽङ्गिरसं भारद्वाजशिष्यमाचार्यं विधिवद्यथाशास्त्रमित्येतत्; उपसन्न उपगतः सन्पप्रच्छ पृष्टवान् । शौनकाङ्गिरसोः सम्बन्धादर्वाग् विधिवद्विशेषणादुपसदनविधेः पूर्वेषामनियम इति गम्यते । मर्यादाकरणार्थं मध्यदीपिकान्यायार्थं वा विशेषणम्; अस्मदादिष्वप्युपसदनविधेरिष्टत्वात् ।

किमित्याह—कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते नु इति वितर्के, भगवो हे भगवन्सर्वं यदिदं विज्ञेयं विज्ञातं विशेषेण ज्ञातमवगतं भवतीति एकस्मिञ्ज्ञाते सर्वविद्भवतीति शिष्टप्रवादं श्रुतवाञ्छौनकस्तद्विशेषं विज्ञातुकामः सन्कस्मिन् न्विति वितर्कयन्पप्रच्छ । अथवा लोकसामान्यदृष्ट्या ज्ञात्वैव पप्रच्छ । सन्ति लोके सुवर्णादिशकलभेदाः सुवर्णत्वाद्व्येकत्वविज्ञानेन विज्ञायमाना लौकिकैः । तथा किं न्वस्ति सर्वस्य जगद्भेदस्यैकं कारणम्, यदेकस्मिन्विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवतीति ।

नन्वविदिते हि कस्मिन्निति प्रश्नोऽनुपपन्नः । किमस्ति तदिति तदा प्रश्नो युक्तः । सिद्धे ह्यस्तित्वे कस्मिन्निति स्यात्, यथा कस्मिन्निधेयमिति ।

नः, अक्षरबाहुल्यादायासभीरुत्वात्प्रश्नः सम्भवत्येव कस्मिन् न्वेकस्मिन्विज्ञाते सर्ववित्स्याद् इति ॥ ३ ॥