अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ॥ ५ ॥
tatrāparā ṛgvedo yajurvedaḥ sāmavedo’tharvavedaḥ śikṣā kalpo vyākaraṇaṃ niruktaṃ chando jyotiṣamiti .
atha parā yayā tadakṣaramadhigamyate .. 5 ..
उनमें अपरा विद्या कौन-सी है, सो बतलाते हैं । ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद—ये चार वेद तथा शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छः वेदांग अपरा विद्या कहे जाते हैं ।
अब यह परा विद्या बतलायी जाती है, जिससे आगे (छठे मन्त्र में) कहे जानेवाले विशेषणों से युक्त उस अक्षर का अधिगम अर्थात् प्राप्ति होती है, क्योंकि ‘अधि’ पूर्वक ‘गम’ धातु प्रायः ‘प्राप्ति’ अर्थ में प्रयुक्त होती है; तथा परमात्मा की प्राप्ति और उसके ज्ञान के अर्थ में कोई भेद भी नहीं है; क्योंकि अविद्या की निवृत्ति ही परमात्मा की प्राप्ति है, इससे भिन्न कोई अन्य वस्तु नहीं ।
शंका—तब तो वह (ब्रह्मविद्या) ऋग्वेदादि से बाह्य है, अतः वह परा विद्या अथवा मोक्ष की साधनभूत किस प्रकार हो सकती है? स्मृतियाँ तो कहती हैं कि “जो वेदबाह्य स्मृतियाँ और जो कोई कुदृष्टियाँ (कुविचार) हैं वे परलोक में निष्फल और नरक की साधन मानी गयी हैं ।” अतः कुदृष्टि होने से निष्फल होने के कारण वह ग्राह्य नहीं हो सकती । तथा इससे उपनिषद् भी ऋग्वेदादि से बाह्य माने जायँगे और यदि इन्हें ऋग्वेदादि में ही माना जायगा तो ‘अथ परा’ आदि वाक्य से जो परा विद्या को पृथक् बतलाया गया है वह व्यर्थ हो जायगा ।
समाधान—ऐसी बात नहीं है; क्योंकि [परा विद्या से] वेद्यविषयक ज्ञान बतलाना अभीष्ट है । यहाँ प्रधानता से यही बतलाना इष्ट है कि उपनिषद्वेद्य अक्षरविषयक विज्ञान ही परा विद्या है, उपनिषद् की शब्दराशि नहीं । और ‘वेद’ शब्द से सर्वत्र शब्दराशि ही कही जाती है । शब्दसमूह का ज्ञान हो जाने पर भी गुरूपसत्ति आदिरूप प्रयत्नान्तर तथा वैराग्य के बिना अक्षरब्रह्म का ज्ञान नहीं हो सकता; इसीलिये ब्रह्मविद्या का पृथक्करण और ‘वह परा विद्या है’ ऐसा कहा गया है ॥ ५ ॥
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तत्र कापरेत्युच्यते—ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद इत्येते चत्वारो वेदाः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमित्यङ्गानि षडेषापरा विद्या ।
अथेदानीमियं परा विद्या उच्यते यया तद्वक्ष्यमाणविशेषणम् अक्षरमधिगम्यते प्राप्यते; अधिपूर्वस्य गमेः प्रायशः प्राप्त्यर्थत्वात् । न च परप्राप्तेरवगमार्थस्य भेदोऽस्ति । अविद्याया अपाय एव हि परप्राप्तिर्नार्थान्तरम् ।
ननु ऋग्वेदादिबाह्या तर्हि सा विद्या, या कथं परा विद्या स्यान्मोक्षसाधनं च । “या वेदबाह्याः स्मृतयो याश्च काश्च कुदृष्टयः । सर्वास्ता निष्फलाः प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ताः स्मृताः ॥ ” (मनु० १२ ।९५) इति हि स्मरन्ति । कुदृष्टित्वान्निष्फलत्वादनादेया स्यात् । उपनिषदां च ऋग्वेदादिबाह्यत्वं स्यात् । ऋग्वेदादित्वे तु पृथक्करणमनर्थकम् अथ परेति ।
न; वेद्यविषयविज्ञानस्य विवक्षितत्वात् । उपनिषद्वेद्याक्षरविषयं हि विज्ञानमिह परा विद्येति प्राधान्येन विवक्षितं नोपनिषच्छब्दराशिः । वेदशब्देन तु सर्वत्र शब्दराशिर्विवक्षितः । शब्दराश्यधिगमेऽपि यत्नान्तरमन्तरेण गुर्वभिगमनादिलक्षणं वैराग्यं च नाक्षराधिगमः सम्भवतीति पृथक्करणं ब्रह्मविद्यायाः परा विद्येति कथनं चेति ॥ ५ ॥
जिस प्रकार विधि (कर्मकाण्ड) के सम्बन्ध में [उसका प्रतिपादन करनेवाले] वाक्यों का अर्थ जानने के समय से भिन्न कर्ता आदि अनेकों कारकों (क्रियानिष्पत्ति के साधनों)- के उपसंहारद्वारा अग्निहोत्र आदि अनुष्ठेय अर्थ रह जाता है, उस प्रकार परा विद्या के सम्बन्ध में नहीं होता । इसका कार्य तो वाक्यार्थज्ञान के समकाल में ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि केवल शब्दों के योग से प्रकाशित होनेवाले अर्थज्ञान में स्थिति कर देने से भिन्न इसका और कोई प्रयोजन नहीं है ।
अतः यहाँ ‘यत्तदद्रेश्यम्’ इत्यादि विशेषणों से विशेषित अक्षरब्रह्म का निर्देश करते हुए उस परा विद्या को विशेषित करते हैं । आगे जो कुछ कहना है उसे अपनी बुद्धि में बिठाकर ‘यत्तद्’ इत्यादि वाक्य से उसका सिद्ध वस्तु के समान उल्लेख करते हैं—
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यथा विधिविषये कर्त्राद्यनेककारकोपसंहारद्वारेण वाक्यार्थज्ञानकालाद् अन्यत्रानुष्ठेयोऽर्थोऽस्ति अग्निहोत्रादिलक्षणो न तथेह परविद्याविषये; वाक्यार्थज्ञानसमकाल एव तु पर्यवसितो भवति । केवलशब्दप्रकाशितार्थज्ञानमात्रनिष्ठाव्यतिरिक्ताभावात् ।
तस्मादिह परां विद्यां सविशेषणेन अक्षरेण विशिनष्टि यत्तदद्रेश्यम् इत्यादिना । वक्ष्यमाणं बुद्धौ संहृत्य सिद्धवत्परामृश्यते—यत्तदिति ।