मुण्डक 1 खण्ड 2 - मन्त्र 10

इष्टापूर्तं मन्यमाना वरिष्ठं नान्यच्छ्रेयो वेदयन्ते प्रमूढाः ।
नाकस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वेमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति ॥ १० ॥

iṣṭāpūrtaṃ manyamānā variṣṭhaṃ nānyacchreyo vedayante pramūḍhāḥ .
nākasya pṛṣṭhe te sukṛte’nubhūtvemaṃ lokaṃ hīnataraṃ vā viśanti .. 10 ..


इष्ट और पूर्त कर्मों को ही सर्वोत्तम माननेवाले वे महामूढ किसी अन्य वस्तु को श्रेयस्कर नहीं समझते । वे स्वर्गलोक के उच्च स्थान में अपने कर्मफलों का अनुभवकर इस [मनुष्य] लोक अथवा इससे भी निकृष्ट लोक में प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

इष्ट यानी यागादि श्रौतकर्म और पूर्त—वापी-कूप-तड़ागादि स्मार्तकर्म ‘ये ही अधिकता से पुरुषार्थ के साधन हैं, अतः ये ही सर्वश्रेष्ठ यानी प्रधान हैं’, इस प्रकार मानते अर्थात् चिन्तन करते हुए वे प्रमूढ— प्रमत्ततावश पुत्र, पशु और बान्धवादि में मूढ हुए लोग आत्मज्ञानसंज्ञक किसी और श्रेयःसाधन को नहीं जानते ।

वे नाक यानी स्वर्ग के पृष्ठ—उच्च स्थान में अपने सुकृत—भोगायतन (पुण्यभोग के लिये प्राप्त हुए दिव्य देह)-में कर्मफल का अनुभव कर अपने अवशिष्ट कर्मानुसार फिर इसी मनुष्यलोक अथवा इससे निकृष्टतर तिर्यङ्नरकादिरूप योनियों में प्रवेश करते हैं ॥ १० ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

इष्टं यागादि श्रौतं कर्म, पूर्तं वापीकूपतडागादि स्मार्तं मन्यमाना एतदेवातिशयेन पुरुषार्थसाधनं वरिष्ठं प्रधानमिति चिन्तयन्तोऽन्यदात्मज्ञानाख्यं श्रेयःसाधनं न वेदयन्ते न जानन्ति, प्रमूढाः पुत्रपशुबन्ध्वादिषु प्रमत्ततया मूढाः ।

ते च नाकस्य स्वर्गस्य पृष्ठ उपरिस्थाने सुकृते भोगायतनेऽनुभूत्वानुभूय कर्मफलं पुनरिमं लोकं मानुषमस्माद्धीनतरं वा तिर्यङ्नरकादिलक्षणं यथाकर्मशेषं विशन्ति ॥ १० ॥