सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥ ११ ॥
tapaḥśraddhe ye hyupavasantyaraṇye śāntā vidvāṃso bhaikṣyacaryāṃ carantaḥ .
sūryadvāreṇa te virajāḥ prayānti yatrāmṛtaḥ sa puruṣo hyavyayātmā .. 11 ..
किन्तु इसके विपरीत जो ज्ञानसम्पन्न वानप्रस्थ और संन्यासी लोग तप और श्रद्धा का—अपने आश्रमविहित कर्म का नाम ‘तप’ है और हिरण्यगर्भादिविषयक विद्या को ‘श्रद्धा’ कहते हैं, उन तप और श्रद्धा का वन में रहकर सेवन करते हैं; तथा जो शान्त—जिनकी इन्द्रियाँ विषयों से निवृत्त हो गयी हैं ऐसे विद्वान् लोग तथा ज्ञानप्रधान गृहस्थ लोग परिग्रह न करने के कारण भिक्षाचर्या का आचरण करते हुए वन में रहते हैं वे विरज अर्थात् जिनके पाप-पुण्य क्षीण हो गये हैं ऐसे होकर सूर्यद्वार से—सूर्योपलक्षित उत्तरमार्ग से वहाँ प्रयाण करते—प्रकर्षतः गमन करते हैं जहाँ—जिस सत्यलोकादि में वह अमृत और अव्ययात्मा—संसार की स्थितिपर्यन्त रहनेवाला अव्ययस्वभाव पुरुष अर्थात् सबसे पहले उत्पन्न हुआ हिरण्यगर्भ रहता है । अपरा विद्या से प्राप्त होनेवाली सांसारिक गतियाँ तो बस यहीं तक हैं ।
शंका—परन्तु कोई-कोई तो इसी को मोक्ष समझते हैं?
समाधान—ऐसा समझना उचित नहीं है । “उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ यहीं लीन हो जाती हैं” “वे संयतचित्त धीर पुरुष उस सर्वगत ब्रह्म को सब ओर प्राप्त कर सभी में प्रवेश कर जाते हैं” इत्यादि श्रुतियों से [ब्रह्मवेत्ता को इसी लोक में सम्पूर्ण कामनाओं से मुक्ति और सर्वात्मभाव की प्राप्ति बतलायी गयी है] । इसके सिवा यह मोक्ष का प्रकरण भी नहीं है । अपरा विद्या के प्रकरण के चालू रहते हुए अकस्मात् मोक्ष का प्रसंग नहीं आ सकता । और उसकी विरजस्कता (निष्पापता) तो आपेक्षिक है । अपरा विद्या का साध्य-साधनरूप, क्रिया-कारक और फलरूप भेदों से भिन्न तथा द्वैतरूप समस्त कार्य इतना ही है जिसका कि हिरण्यगर्भ की प्राप्ति में पर्यवसान होता है । स्थावरों से लेकर क्रमशः संसारगति की गणना करते हुए मनुजी ने भी ऐसा ही कहा है—“ब्रह्मा, मरीचि आदि प्रजापतिगण, यमराज, महत्तत्त्व और अव्यक्त [इनके लोकों को प्राप्त होना]—यह विद्वानों ने उत्तम सात्त्विकी गति बतलायी है” ॥ ११ ॥
संस्कृत भाष्य पढ़ें
ये पुनस्तद्विपरीता ज्ञानयुक्ता वानप्रस्थाः संन्यासिनश्च तपःश्रद्धे हि तपः स्वाश्रमविहितं कर्म श्रद्धा हिरण्यगर्भादिविषया विद्या; ते तपःश्रद्धे उपवसन्ति सेवन्तेऽरण्ये वर्तमानाः सन्तः शान्ता उपरतकरणग्रामाः, विद्वांसो गृहस्थाश्च ज्ञानप्रधाना इत्यर्थः । भैक्ष्यचर्यां चरन्तः परिग्रहाभावादुपवसन्त्यरण्य इति सम्बन्धः सूर्यद्वारेण सूर्योपलक्षितेनोत्तरायणेन पथा ते विरजा विरजसः क्षीणपुण्यपापकर्माणः सन्त इत्यर्थः, प्रयान्ति प्रकर्षेण यान्ति यत्र यस्मिन्सत्यलोकादावमृतः स पुरुषः प्रथमजो हिरण्यगर्भो ह्यव्ययात्माव्ययस्वभावो यावत्संसारस्थायी । एतदन्तास्तु संसारगतयोऽपरविद्यागम्याः ।
ननु—एतं मोक्षमिच्छन्ति केचित् ।
न, “इहैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामाः” (मु० उ० ३ ।२ ।२) “ते सर्वगं सर्वतः प्राप्य धीरा युक्तात्मानः सर्वमेवाविशन्ति” (मु० उ० ३ ।२ ।५) इत्यादिश्रुतिभ्योऽप्रकरणाच्च । अपरविद्याप्रकरणे हि प्रवृत्ते न ह्यकस्मान्मोक्षप्रसङ्गोऽस्ति । विरजस्त्वं त्वापेक्षिकम् । समस्तमपरविद्याकार्यं साध्यसाधनलक्षणं क्रियाकारकफलभेदभिन्नं द्वैतम् एतावदेव यद्धिरण्यगर्भप्राप्त्यवसानम् । तथा च मनुनोक्तं स्थावराद्यां संसारगतिमनुक्रामता “ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च । उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः” (मनु० १२ ।५०) इति ॥ ११ ॥