मुण्डक 1 खण्ड 2 - मन्त्र 12

परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन ।
तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् ॥ १२ ॥

parīkṣya lokānkarmacitānbrāhmaṇo nirvedamāyānnāstyakṛtaḥ kṛtena .
tadvijñānārthaṃ sa gurumevābhigacchet samitpāṇiḥ śrotriyaṃ brahmaniṣṭham .. 12 ..


कर्मद्वारा प्राप्त हुए लोकों की परीक्षा कर ब्राह्मण निर्वेद को प्राप्त हो जाय, [क्योंकि संसार में] अकृत (नित्य पदार्थ) नहीं है, और कृत से [हमें प्रयोजन क्या है? ] अतः उस नित्य वस्तु का साक्षात् ज्ञान प्राप्त करने के लिये तो हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के ही पास जाना चाहिये ॥ १२ ॥

यह जो ऋग्वेदादि अपरविद्याविषयक तथा अविद्यादि दोषयुक्त पुरुष के लिये ही विहित होने के कारण स्वभाव से ही अविद्या काम और कर्मरूप दोष से युक्त पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान किये जानेयोग्य कर्म है तथा उसके अनुष्ठान के कार्यभूत अर्थात् फलस्वरूप दक्षिण एवं उत्तरमार्गरूप लोक हैं और विहित कर्म के न करने एवं प्रतिषिद्ध के करने के दोष से प्राप्त होनेवाली जो नरक, तिर्यक् तथा प्रेतादि योनियाँ हैं उन इन सभी की परीक्षा कर अर्थात् प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और आगम—इन चारों प्रमाणों से सब प्रकार उनका यथावत् निश्चय कर जो बीज और अंकुर के समान एक-दूसरे की उत्पत्ति के कारण हैं, अनेकों—सैकड़ों-हजारों अनर्थों से व्याप्त हैं, केले के भीतरी भाग के समान सारहीन हैं, माया, मृगजल और गन्धर्वनगर के समान भ्रमपूर्ण तथा स्वप्न, जलबुद्बुद और फेन के सदृश क्षण-क्षण में नष्ट होनेवाले हैं और अविद्या एवं कामरूप दोष से प्रवर्तित कर्मों से प्राप्त यानी धर्माधर्मजनित हैं उन व्यक्त-अव्यक्तरूप तथा संसारगति भूत अव्यक्त से लेकर स्थावरपर्यन्त समस्त लोकों की ओर से मुख मोड़कर ब्राह्मण [उनसे विरक्त हो जाय] । सर्वत्याग के द्वारा ब्राह्मण का ही ब्रह्म-विद्या में विशेषरूप से अधिकार है; इसलिये यहाँ ‘ब्राह्मण’ पद का ग्रहण किया गया है । इस प्रकार लोकों की परीक्षा कर वह क्या करे, सो बतलाते हैं—‘निर्वेद करे’ । यहाँ ‘नि’ पूर्वक ‘विद्’ धातु वैराग्य अर्थ में है; अतः तात्पर्य यह है कि ‘वैराग्य करे’ ।

अब वह वैराग्य का प्रकार दिखलाया जाता है । इस संसार में कोई भी अकृत (नित्य) पदार्थ नहीं है । सभी लोक कर्म से सम्पादन किये जानेवाले हैं और कर्मकृत होने के कारण अनित्य हैं । तात्पर्य यह कि इस संसार में नित्य कुछ भी नहीं है । सारा कर्म अनित्य फल का ही साधन है । क्योंकि सारे कर्म, कार्य, उत्पाद्य, आप्य और विकार्य अथवा संस्कार्य चार ही प्रकार के हैं, इनसे भिन्न कर्म का और कोई प्रकार नहीं है । किन्तु मैं तो एक नित्य, अमृत, अभय, कूटस्थ, अचल और ध्रुव पदार्थ की इच्छा करनेवाला हूँ; उससे विपरीत स्वभाववाले की मुझे आवश्यकता नहीं है । अतः इस श्रमबहुल एवं अनर्थ के साधनभूत कृतकर्म से मुझे क्या प्रयोजन है? इस प्रकार विरक्त होकर जो अभय, शिव, अकृत और नित्य-पद है उसके विज्ञान के लिये—विशेषतया जानने के लिये वह विरक्त ब्राह्मण शम-दमादिसम्पन्न गुरु यानी आचार्य के पास ही जाय । शास्त्रज्ञ होने पर भी स्वतन्त्रतापूर्वक ब्रह्मज्ञान का अन्वेषण न करे—यही ‘गुरुमेव’ इस पदसमूह में आये हुए निश्चयात्मक ‘एव’ पद का अभिप्राय है ।

समित्पाणिः अर्थात् हाथ में समिधाओं का भार लेकर श्रोत्रिय यानी अध्ययन और श्रवण किये अर्थ से सम्पन्न तथा ब्रह्मनिष्ठ [गुरु के पास जाय]— सम्पूर्ण कर्मों को त्यागकर जिसकी केवल अद्वितीय ब्रह्म में ही निष्ठा है वह ब्रह्मनिष्ठ कहलाता है; जपनिष्ठ—तपोनिष्ठ आदि के समान ही यह ‘ब्रह्मनिष्ठ’ शब्द है । कर्मठ पुरुष को ब्रह्मनिष्ठा कभी नहीं हो सकती, क्योंकि कर्म और आत्मज्ञान का परस्पर विरोध है । इस प्रकार उन गुरुदेव के पास विधिपूर्वक जाकर उन्हें प्रसन्न कर सत्य और अक्षर पुरुष के सम्बन्ध में पूछे ॥ १२ ॥

संस्कृत भाष्य पढ़ें

परीक्ष्य यदेतदृग्वेदाद्यपरविद्याविषयं स्वाभाविक्यविद्याकामकर्मदोषवत्पुरुषानुष्ठेयमविद्यादिदोषवन्तमेव पुरुषं प्रति विहितत्वात्तदनुष्ठानकार्यभूताश्च लोका ये दक्षिणोत्तरमार्गलक्षणाः फलभूताः, ये च विहिताकरणप्रतिषेधातिक्रमदोषसाध्या नरकतिर्यक्प्रेतलक्षणास्तानेतान्परीक्ष्य प्रत्यक्षानुमानोपमानागमैः सर्वतो याथात्म्येनावधार्य लोकान् संसारगतिभूतान् अव्यक्तादिस्थावरान्तान्व्याकृताव्याकृतलक्षणान् बीजाङ्कुरवदितरेतरोत्पत्तिनिमित्ताननेकानर्थशतसहस्रसङ्कुलान्कदलीगर्भवदसारान् मायामरीच्युदकगन्धर्वनगराकारस्वप्नजलबुद्बुदफेनसमान्प्रतिक्षणप्रध्वंसान्पृष्ठतः कृत्वाविद्याकामदोषप्रवर्तितकर्मचितान्धर्माधर्मनिर्वर्तितानित्येतत् ।

ब्राह्मणस्यैव विशेषतोऽधिकारः सर्वत्यागेन ब्रह्मविद्यायामिति ब्राह्मणग्रहणम् । परीक्ष्य लोकान्किं कुर्याद् इत्युच्यते निर्वेदम् । निःपूर्वो विदिरत्र वैराग्यार्थे वैराग्यमायात्कुर्यादित्येतत् ।

स वैराग्यप्रकारः प्रदर्श्यते । इह संसारे नास्ति कश्चिदप्यकृतः पदार्थः । सर्व एव हि लोकाः कर्मचिताः कर्मकृतत्वाच्चानित्याः, न नित्यं किञ्चिदस्तीत्यभिप्रायः । सर्वं तु कर्मानित्यस्यैव साधनम् । यस्माच्चतुर्विधमेव हि सर्वं कर्म कार्यमुत्पाद्यमाप्यं संस्कार्यं विकार्यं वा, नातः परं कर्मणो विशेषोऽस्ति । अहं च नित्येन अमृतेनाभयेन कूटस्थेनाचलेन ध्रुवेणार्थेनार्थी न तद्विपरीतेन । अतः किं कृतेन कर्मणायासबहुलेनानर्थसाधनेनेत्येवं निर्विण्णोऽभयं शिवमकृतं नित्यं पदं यत्तद्विज्ञानार्थं विशेषेणाधिगमार्थं स निर्विण्णो ब्राह्मणो गुरुमेवाचार्यं शमदमदयादिसम्पन्नमभिगच्छेत् ।

शास्त्रज्ञोऽपि स्वातन्त्र्येण ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यादित्येतद् गुरुमेवेत्यवधारणफलम् ।

समित्पाणिः समिद्भारगृहीतहस्तः श्रोत्रियमध्ययनश्रुतार्थसम्पन्नं ब्रह्मनिष्ठं हित्वा सर्वकर्माणि केवलेऽद्वये ब्रह्मणि निष्ठा यस्य सोऽयं ब्रह्मनिष्ठो जपनिष्ठस्तपोनिष्ठ इति यद्वत् । न हि कर्मिणो ब्रह्मनिष्ठता सम्भवति कर्मात्मज्ञानयोर्विरोधात् । स तं गुरुं विधिवदुपसन्नः प्रसाद्य पृच्छेदक्षरं पुरुषं सत्यम् ॥ १२ ॥